पटना डीएम कार्यालय पर हाईकोर्ट ने लगाया 5 हजार का जुर्माना, अपील में अनावश्यक देरी पर की कार्रवाई
पटना। पटना हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील दाखिल करने में अनावश्यक देरी को गंभीर लापरवाही मानते हुए पटना जिलाधिकारी (डीएम) कार्यालय पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि तय समय-सीमा के भीतर विधि विभाग और महाधिवक्ता कार्यालय की ओर से लीगल ओपिनियन दिए जाने के बावजूद यदि अपील दाखिल करने में देरी होती है, तो यह प्रशासनिक तंत्र की उदासीनता और गैर-जिम्मेदाराना रवैये को दर्शाता है। ऐसे मामलों में देरी को सामान्य प्रक्रिया मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मामला राज्य सरकार द्वारा निचली अदालत के एक फैसले को चुनौती देने से जुड़ा है। निचली अदालत ने एक आपराधिक मामले में अभियुक्त को बरी कर दिया था। इसके बाद राज्य सरकार की ओर से उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील दायर करने की प्रक्रिया शुरू की गई। सामान्यतः आपराधिक मामलों में अपील निर्धारित अवधि के भीतर दाखिल की जानी होती है। लेकिन इस प्रकरण में अपील दाखिल करने में काफी विलंब हुआ, जिस पर न्यायालय ने संज्ञान लिया। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि महाधिवक्ता कार्यालय और विधि विभाग ने मामले में तय समय के भीतर अपना कानूनी परामर्श (लीगल ओपिनियन) उपलब्ध करा दिया था। इसके बावजूद डीएम कार्यालय की ओर से अपील की फाइल आगे बढ़ाने और उसे विधिवत दाखिल करने में देरी हुई। न्यायालय ने टिप्पणी की कि जब संबंधित विभागों ने समय पर अपना काम पूरा कर दिया था, तब प्रशासनिक स्तर पर अपील दायर करने में लापरवाही को स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि अपील में देरी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करती है और न्याय मिलने की समयबद्ध व्यवस्था में बाधा उत्पन्न करती है। कोर्ट ने कहा कि राज्य की ओर से दाखिल की जाने वाली अपीलें केवल औपचारिकता नहीं हैं, बल्कि इनका उद्देश्य न्यायिक निर्णयों की समीक्षा कराना और कानून के हित में उचित कार्रवाई सुनिश्चित करना होता है। ऐसे में यदि प्रशासनिक कार्यालयों की ढिलाई के कारण अपील देरी से दाखिल होती है, तो इससे न केवल सरकारी पक्ष कमजोर होता है, बल्कि न्यायालय का समय भी प्रभावित होता है।हाईकोर्ट ने इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए पटना डीएम कार्यालय पर 5,000 रुपये का हर्जाना लगाया। अदालत ने जुर्माना लगाते हुए यह संदेश देने की कोशिश की कि सरकारी तंत्र में जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है और न्यायिक कार्यवाही में अनावश्यक देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर आर्थिक दंड लगाया जा सकता है। कोर्ट की इस कार्रवाई को प्रशासनिक महकमे के लिए सख्त चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। जानकारों के अनुसार, हाईकोर्ट का यह रुख भविष्य में ऐसे मामलों में सतर्कता बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है। इससे सरकारी कार्यालयों पर यह दबाव भी बनेगा कि वे अदालतों से जुड़े मामलों में समय पर कार्रवाई करें और फाइलों को अनावश्यक रूप से लंबित न रखें। इस आदेश के बाद पटना डीएम कार्यालय और संबंधित विभागों को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने की जरूरत पड़ सकती है, ताकि न्यायालय के समक्ष ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो। अदालत के इस आदेश के बाद प्रशासनिक स्तर पर भी हलचल देखी जा रही है। माना जा रहा है कि आगे से अपीलों की समय-सीमा पर विशेष निगरानी रखने और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए आंतरिक व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। वहीं, कोर्ट के इस फैसले को कानूनी प्रक्रिया में अनुशासन और समयबद्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक अहम कदम माना जा रहा है।


