पटना की गंगा नदी से विलुप्त हो रही मछलियों की प्रजाति, सर्वे में बड़ा खुलासा, 50 फ़ीसदी तक की गिरावट

पटना। बिहार की जीवनरेखा मानी जाने वाली गंगा नदी से मछलियों की कई स्थानीय प्रजातियां धीरे-धीरे गायब होती जा रही हैं। पटना विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक हालिया सर्वे में यह गंभीर तथ्य सामने आया है कि पटना के आसपास गंगा के लगभग 30 किलोमीटर क्षेत्र में मछलियों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। सर्वे के अनुसार पिछले 15 वर्षों में स्थानीय प्रजाति की मछलियों की संख्या में लगभग 31 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि कुल मछलियों की संख्या में 40 से 50 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। इस स्थिति ने मछुआरों के साथ-साथ पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की चिंता भी बढ़ा दी है। मछुआरा समितियों ने भी इस सर्वे के निष्कर्षों की पुष्टि करते हुए कहा है कि गंगा में पहले की तुलना में अब बहुत कम मछलियां मिल रही हैं।
गंगा में मछलियों की घटती संख्या
पटना विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक और डॉल्फिन मैन के नाम से प्रसिद्ध डॉ. रवीन्द्र कुमार सिन्हा के अनुसार गंगा नदी में मछलियों की संख्या घटने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। उन्होंने बताया कि नदी के पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव और विदेशी प्रजातियों का प्रवेश इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। डॉ. सिन्हा के अनुसार थाई मांगुर नामक विदेशी प्रजाति का गंगा नदी में प्रवेश स्थानीय मछलियों के लिए बड़ा खतरा बन गया है। यह मछली अफ्रीकी प्रजाति की होती है और काफी आक्रामक स्वभाव की मानी जाती है। इसके कारण कई स्थानीय प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में गंगा से कई पारंपरिक मछलियों की प्रजातियां पूरी तरह समाप्त हो सकती हैं।
पुराने सर्वे और नए आंकड़ों में बड़ा अंतर
गंगा नदी में मछलियों की प्रजातियों को लेकर पहले भी कई सर्वे किए जा चुके हैं। वर्ष 1993 से 1995 के बीच पटना के आसपास लगभग 30 किलोमीटर क्षेत्र में किए गए एक सर्वे में 106 प्रकार की स्थानीय मछलियों की पहचान की गई थी। इसके बाद वर्ष 2007 से 2009 के बीच एक शोधार्थी द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट में भी कुल 106 प्रजातियों का उल्लेख किया गया था। इनमें 96 स्थानीय प्रजातियां और 10 नई प्रजातियां शामिल थीं। लेकिन हाल ही में वर्ष 2023 और 2024 के दौरान किए गए सर्वे में केवल 78 प्रकार की मछलियों की पहचान हो पाई है। इनमें भी कई विदेशी प्रजातियां शामिल हैं, जिनमें थाई मांगुर प्रमुख है। यह आंकड़ा स्पष्ट संकेत देता है कि गंगा नदी में मछलियों की विविधता तेजी से घट रही है।
सिफरी के सर्वे पर उठे सवाल
केन्द्रीय अन्तर्स्थलीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान द्वारा वर्ष 2010 और 2011 के दौरान गंगा नदी में मछलियों की प्रजातियों को लेकर एक सर्वे किया गया था। इस सर्वे में पटना के आसपास गंगा में केवल 40 प्रकार की मछलियों का उल्लेख किया गया था। हालांकि कई विशेषज्ञों ने इस सर्वे के निष्कर्षों पर सवाल उठाए थे और नए सर्वे की मांग की थी। विशेषज्ञों का कहना था कि गंगा जैसे बड़े नदी तंत्र में मछलियों की प्रजातियों की संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। इसके बावजूद अब तक बिहार या पटना क्षेत्र में इस संस्थान द्वारा दोबारा कोई विस्तृत सर्वे नहीं कराया गया है।
मछुआरों की आजीविका पर भी असर
गंगा में मछलियों की संख्या घटने का सीधा असर मछुआरों की आजीविका पर भी पड़ रहा है। बिहार राज्य मत्स्यजीवी सहकारी संघ के प्रबंध निदेशक ऋषिकेश कश्यप के अनुसार पिछले एक दशक में गंगा नदी में मछलियों के शिकार में लगभग 40 से 50 प्रतिशत तक कमी आई है। उन्होंने बताया कि पटना और आसपास के क्षेत्रों में मछुआरों को अब केवल बाढ़ के समय ही अपेक्षाकृत अधिक मछलियां मिल पाती हैं। बाकी समय उन्हें मछली पकड़ने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इस स्थिति के कारण कई मछुआरे आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं और उनकी पारंपरिक आजीविका पर भी खतरा मंडरा रहा है।
मछलियों की संख्या घटने के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों के अनुसार गंगा नदी में मछलियों की संख्या घटने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। इनमें सबसे बड़ा कारण विदेशी प्रजाति की मछलियों का अनियंत्रित पालन माना जा रहा है। थाई मांगुर जैसी प्रतिबंधित प्रजातियां स्थानीय मछलियों के लिए गंभीर खतरा बन गई हैं। इसके अलावा आर्द्रभूमि, तालाब और झीलों का सूखना तथा उन पर बढ़ता अतिक्रमण भी इस समस्या को बढ़ा रहा है। ये जलस्रोत मछलियों के प्रजनन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन इनके नष्ट होने से मछलियों की संख्या पर असर पड़ रहा है। गंगा नदी में पानी का स्तर लगातार कम होना भी एक बड़ा कारण है। इसके साथ ही नदी के पानी में कीटनाशकों और अन्य रसायनों की बढ़ती मात्रा से भी मछलियों के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। इसके अलावा छोटी मछलियों का अत्यधिक शिकार भी मछलियों की संख्या में गिरावट का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।
भविष्य के लिए चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गंगा नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में यह समस्या और गंभीर हो सकती है। गंगा केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं है, बल्कि यह लाखों लोगों की आजीविका का भी आधार है। इसलिए नदी के जल, पर्यावरण और जैव विविधता को सुरक्षित रखना बेहद आवश्यक है। वैज्ञानिकों का कहना है कि मछलियों की प्रजातियों को बचाने के लिए विदेशी प्रजातियों पर नियंत्रण, प्रदूषण में कमी और जलस्रोतों के संरक्षण जैसे कदम तुरंत उठाए जाने चाहिए। फिलहाल सर्वे के आंकड़ों ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि गंगा में मछलियों की संख्या तेजी से घट रही है और यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो इसका असर पर्यावरण और लोगों की आजीविका दोनों पर पड़ सकता है।

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