पटना में आवारा कुत्तों का आतंक, 29280 लोग हुए शिकार, रेबीज का खतरा बढ़ा
पटना। राजधानी पटना समेत पूरे बिहार में आवारा कुत्तों का आतंक अब एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है। हाल ही में राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में इन दिनों सबसे तेजी से फैलने वाली “बीमारी” कैंसर या टीबी नहीं, बल्कि कुत्ते का काटना बन गई है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2023–24 में राज्यभर में कुत्ते के काटने के 2 लाख 44 हजार 367 मामले दर्ज किए गए थे, जो अगले ही वर्ष 2024–25 में बढ़कर 2 लाख 83 हजार 274 तक पहुंच गए। महज एक साल के भीतर करीब 39 हजार मामलों की वृद्धि ने प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग दोनों की चिंता बढ़ा दी है। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, कुत्ते के काटने के मामलों में पटना जिला सबसे आगे रहा, जहां अकेले 29 हजार 280 लोग आवारा कुत्तों का शिकार बने। इसके बाद पूर्वी चंपारण, नालंदा और गोपालगंज जैसे जिले आते हैं, जहां बड़ी संख्या में लोगों को इलाज के लिए अस्पतालों का रुख करना पड़ा। दूसरी ओर औरंगाबाद में केवल 467 मामले दर्ज किए गए, जो पूरे राज्य में सबसे कम हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह अंतर साफ तौर पर दर्शाता है कि जनसंख्या घनत्व, शहरीकरण की गति, कचरा प्रबंधन की स्थिति और आवारा कुत्तों की संख्या का सीधा असर इन आंकड़ों पर पड़ रहा है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का मानना है कि यह समस्या अब केवल शहरी इलाकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी तेजी से फैल रही है। गांवों में जागरूकता की कमी, प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और समय पर टीकाकरण न हो पाना स्थिति को और गंभीर बना रहा है। कई मामलों में लोग मामूली घाव समझकर इलाज में देरी कर देते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि आर्थिक सर्वेक्षण में रेबीज के मामलों का अलग से विस्तृत उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन वैश्विक स्तर पर स्थिति बेहद चिंताजनक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर साल दुनिया भर में करीब 59 हजार लोगों की मौत रेबीज से होती है और इनमें अधिकांश मामले संक्रमित कुत्तों के काटने से जुड़े होते हैं। चिकित्सकों के मुताबिक रेबीज ऐसा घातक रोग है, जिसमें एक बार लक्षण दिखाई देने के बाद इलाज संभव नहीं होता। ऐसे में समय पर एंटी-रेबीज टीका लगवाना ही एकमात्र प्रभावी बचाव है। आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी सामने आया है कि वर्ष 2024–25 के दौरान बिहार में सांप के काटने से 138 लोगों की मौत हुई। यह आंकड़ा बताता है कि राज्य में जंतुजनित खतरे केवल डर का विषय नहीं, बल्कि सीधे तौर पर लोगों की जान पर असर डाल रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते पर्यावरण, बढ़ते कचरे और तेजी से फैलते शहरीकरण के कारण इंसानों और जानवरों के बीच टकराव बढ़ रहा है, जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई इलाकों में आवारा कुत्तों के झुंड दिनभर सड़कों और गलियों में घूमते रहते हैं। बच्चों, बुजुर्गों और दोपहिया वाहन चालकों पर अचानक हमला कर देना अब आम बात हो गई है। कई स्कूलों के आसपास भी कुत्तों का जमावड़ा देखा जा रहा है, जिससे अभिभावकों में डर का माहौल है। नगर निकायों द्वारा नसबंदी और टीकाकरण जैसे कार्यक्रम कागजों तक सीमित नजर आ रहे हैं, जबकि जमीनी स्तर पर इनका असर बहुत कम दिखाई देता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि समस्या के समाधान के लिए बहुस्तरीय रणनीति की जरूरत है। इसमें आवारा कुत्तों की नियमित गणना, बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान, रेबीज टीकाकरण, कचरा प्रबंधन को मजबूत करना और लोगों में जागरूकता फैलाना शामिल है। साथ ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर एंटी-रेबीज इंजेक्शन और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी जरूरी है। कुत्ते के काटने के बढ़ते मामले बिहार के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं। यह अब केवल व्यक्तिगत सुरक्षा का सवाल नहीं रहा, बल्कि एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर चुका है। सवाल यह है कि क्या सरकार और स्थानीय प्रशासन आवारा कुत्तों के नियंत्रण और व्यापक टीकाकरण को लेकर ठोस नीति बनाएंगे, या फिर हर दिन औसतन सैकड़ों लोगों के शिकार होने का यह सिलसिला यूं ही जारी रहेगा। आम जनता की नजर अब इसी पर टिकी है कि इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए कब और कैसे प्रभावी कदम उठाए जाते हैं।


