दिल्ली में अमित शाह तो बिहार में ललन सिंह-आरसीपी सिंह की खामोशी,कहीं बदलते राजनीतिक समीकरण के संकेत तो नहीं….

पटना।(बन बिहारी)कोरोना आपदा के महात्रासदी काल से देश तथा राज्य भी जूझ रहे हैं।हालांकि देश में कोरोना के महाआपदा काल के दौरान भी सियासत उफान पर हैं।उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बनाम प्रियंका गांधी मामला जोरों पर हैं। बिहार के चुनाव भी सिर पर ही हैं।ऐसे सियासी माहौल में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तथा बिहार में नीतीश सरकार के नंबर दो समझे जाने वाले सांसद ललन सिंह तथा सांसद आरसीपी सिंह तीनों का राजनीतिक परिदृश्य से एक तरह से पूरे कोरोना काल के दौरान गुम हो जाना कुछ ना कुछ अचरज पैदा जरूर करता है। प्रदेश के सियासी गलियारों में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की लंबी खामोशी तथा बिहार के दोनों सर्वाधिक दिग्गज जदयू सांसदों आरसीपी सिंह तथा ललन सिंह का कोरोना काल के दौरान पूरी तरह से मुख्यधारा से दूरी की चर्चा जोरों पर हैं। राजनीतिक प्रेक्षक को का मानना है कि भाजपा-जदयू के बीच कभी कुछ पूरी तरह से ठीक नहीं रहता।अमूमन अधिकांश मुद्दों पर अलग-अलग स्टैंड रखने वाले भाजपा तथा जदयू आज तक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के एजेंडे को भी राज्य में पूरी तरह से ग्राउंड लेवल पर अपने कार्यकर्ताओं के बीच सेट नहीं कर सके हैं। कई गंभीर मसलों पर भाजपा तथा जदयू की दूरी जनता तथा मीडिया की नजरों में सार्वजनिक हो चुकी है।मगर बेहतरीन पॉलिटिकल मैनेजमेंट के बदौलत लंबे समय से भाजपा तथा जदयू का गठबंधन कायम है।हालांकि 2013 में यह गठबंधन केंद्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को लेकर टूट गया था।मगर 2017 में बिहार के मुख्यमंत्री तथा जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार राजद-कांग्रेस से गठबंधन छोड़कर पुनः भाजपा के साथ आ गए।राजनीति के विशारदों का मानना है कि नीतीश कुमार दोबारा गठबंधन भी अपनी शर्तों में ही किए थे। फिलहाल गत वर्ष के लोकसभा चुनाव तो भाजपा-जदयू के लिए बगैर किसी विवाद के गुजर गए।मगर आसन्न विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा तथा जदयू अपने अपने तरीके से रणनीति बनाने में लगे हुए हैं।कल ही राजद की ओर से पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी ने यह बयान देकर सबको चौंका दिया की भाजपा इस बार बिहार में विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार को फेस बनाकर नहीं लड़ने जा रही है।अब शिवानंद तिवारी के बयान में कितनी सत्यता तथा कितनी कल्पना है।यह तो वक्त बताएगा।मगर केंद्रीय स्तर पर गृह मंत्री अमित शाह की खामोशी तथा बिहार में ललन-आरसीपी दोनों की कोरोना काल में राजनीतिक ‘बेपरवाही’ कुछ और ही इशारा कर रही है।राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि आम तौर पर जब भी बिहार में कुछ बड़ा ‘इशू’ चल रहा होता है।तो सरकार को डिफेंड करने के लिए तथा विपक्ष पर प्रेशर बनाने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बाद सांसद ललन सिंह या आरसीपी सिंह का बयान ही मीडिया आते रहे हैं।साथ ही कितने मौकों पर ब्यूरोक्रेसी की मैनेजमेंट का कमान भी इन दोनों राजनीतिक सुरमाओं ने संभाला था। मगर इस बार पूरे कोरोना काल के दौरान राज्य सरकार के सिंचाई मंत्री तथा नीतीश कुमार के खास संजय झा तथा कांग्रेस से आयातित भवन निर्माण मंत्री अशोक चौधरी ने कमोबेश यह बागडोर संभाल रखी थी।अब जदयू के अंदर खाने में क्या कुछ चल रहा है,फिलहाल तो यह वक़्त के गर्भ में छिपा है।मगर वर्तमान राजनीतिक हालात भविष्य की राजनीति के कुछ अलग ही सिग्नल दे रहा है।

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