January 31, 2026

दीपक प्रकाश ने संभाला पदभार, मीडिया के सवालों पर भड़के, कहा- मेरा समय बर्बाद न करें

पटना। बिहार में हाल ही में गठित नई सरकार में मंत्रिपद को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में शामिल हुए दीपक प्रकाश ने शनिवार को पंचायती राज विभाग का कार्यभार संभाल लिया। लेकिन पदभार ग्रहण के साथ ही वह विवादों में घिर गए, क्योंकि दीपक प्रकाश न तो विधायक हैं और न ही विधान परिषद के सदस्य। इसके बावजूद मंत्री बनाए जाने से विपक्ष ही नहीं, कई राजनीतिक विश्लेषक भी सवाल उठा रहे हैं कि यह फैसला योग्यता पर आधारित था या परिवारवाद का उदाहरण है।
मीडिया के सवालों पर तैश में आए दीपक
पदभार ग्रहण करते समय पत्रकारों ने जब उनसे पूछा कि बिना किसी सदन का सदस्य बने उन्हें मंत्री क्यों बनाया गया और क्या यह परिवारवाद नहीं है, तो वह असहज हो उठे। उन्होंने सवालों को टालते हुए कहा कि इस प्रकार का प्रश्न पूछकर उनका समय बर्बाद न किया जाए। अपने जवाब में उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन पर भरोसा जताया है और वह इस भरोसे पर खरा उतरने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने आगे कहा कि पंचायती राज विभाग में उनके सामने बड़ी जिम्मेदारी है और वह जनता के विकास के लिए समर्पित होकर काम करेंगे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पंचायती राज की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि वे इस व्यवस्था को और मजबूत करने का काम करेंगे।
उपेंद्र कुशवाहा पर बढ़ा दबाव
दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए जाने की वजह से राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा भी आलोचनाओं के घेरे में आ गए हैं। क्योंकि कुशवाहा की पत्नी पहले ही विधायक बन चुकी हैं और खुद उपेंद्र कुशवाहा राज्यसभा सांसद हैं। ऐसे में अब बेटे को मंत्री बनाए जाने को विपक्ष ने परिवारवादी राजनीति का स्पष्ट उदाहरण बताया है। इस आलोचना पर प्रतिक्रिया देते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने सोशल मीडिया पर लंबा पोस्ट जारी किया। उन्होंने लिखा कि पार्टी के अस्तित्व को बचाने के लिए उन्हें यह फैसला लेना पड़ा। उन्होंने कहा कि इसे परिवारवाद कहकर आलोचना करना आसान है, लेकिन पार्टी को बचाए रखने की विवशता को भी समझा जाना चाहिए।
कुशवाहा का खुलकर बचाव
उपेंद्र कुशवाहा ने अपने पोस्ट में अपने पुराने राजनीतिक अनुभवों का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने पहले भी ऐसे निर्णय लिए थे जिनकी भारी आलोचना हुई, लेकिन वे पार्टी के हित में अनिवार्य थे। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि पहले विलय जैसी कठोर और अप्रसिद्ध नीति अपनानी पड़ी थी और उसका भारी नुकसान भी झेलना पड़ा। उन्होंने कहा कि कई बार फैसला “ज़हर पीने” जैसा कठिन होता है, लेकिन पार्टी को शून्य पर लौटने से बचाने के लिए यह कदम उठाना ज़रूरी हो गया था। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि परिवारवाद का आरोप वह स्वीकार करते हैं, लेकिन यह निर्णय मजबूरी में लिया गया है। उनका कहना है कि वर्तमान राजनीतिक हालात में पार्टी के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए कोई विकल्प शेष नहीं था।
राजनीतिक समीकरण और नई सरकार की तस्वीर
नई नीतीश सरकार में रालोमो को एक मंत्री पद दिया गया है और यह पद सीधे तौर पर दीपक प्रकाश को मिलने से रालोमो की अंदरूनी राजनीति भी चर्चा में है। पार्टी के चार विधायकों की जीत के बावजूद मंत्री पद के लिए बेटे का चयन कई पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भी सवाल खड़ा कर रहा है। इसके अलावा, यह भी ध्यान देने योग्य है कि बिहार की नई सरकार में इससे पहले ही कई मंत्री परिवारवाद के आरोपों से घिरे हैं। ऐसे में दीपक प्रकाश का शामिल होना इस बहस को और तेज करता है।
दीपक प्रकाश की आगे की राह
पदभार संभालने के बाद अब दीपक प्रकाश के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनता और राजनीतिक विरोधियों की धारणा को बदलने की होगी। वे किस प्रकार पंचायती राज विभाग को नई दिशा देते हैं और क्या वह अपनी नीतिगत क्षमता से आलोचनाओं को शांत कर पाएंगे, यह आने वाला समय बताएगा। उधर, उपेंद्र कुशवाहा ने पार्टी को एकजुट रखने के लिए जिस मजबूरी का हवाला दिया है, वह भी आने वाले दिनों में उनकी राजनीति की दिशा तय करेगा। बिहार की नई सरकार में विभागों का औपचारिक बंटवारा जल्द ही होने वाला है, जिसके बाद मंत्रियों की वास्तविक कार्यशैली पर जनता की नजर होगी। राजनीति में परिवारवाद की बहस पुरानी है, लेकिन यह मामला फिर एक बार इस मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला खड़ा करता है।

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