प्राथमिक स्कूलों में अब बच्चों को नहीं मिलेंगे यूनिफार्म के पैसे, जीविका दीदियों के माध्यम से होगी ड्रेस की व्यवस्था
पटना। बिहार में प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा बदलाव सामने आने वाला है। राज्य सरकार अब कक्षा 1 से 5 तक के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को यूनिफॉर्म के लिए नकद राशि देने की व्यवस्था को खत्म कर सकती है। इसकी जगह बच्चों को सीधे सिलकर तैयार यूनिफॉर्म उपलब्ध कराने की योजना पर विचार चल रहा है। यह काम जीविका दीदियों के माध्यम से कराने की तैयारी है। इस पहल के जरिए सरकार शिक्षा और रोजगार, दोनों क्षेत्रों को एक साथ साधने की कोशिश कर रही है।
यूनिफॉर्म व्यवस्था में बदलाव का संकेत
ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने हाल ही में इस दिशा में स्पष्ट संकेत दिए। उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में शिक्षा विभाग बच्चों के अभिभावकों के खाते में यूनिफॉर्म के लिए नकद राशि भेजता है, लेकिन कई बार यह पैसा घर की अन्य जरूरतों में खर्च हो जाता है। नतीजतन, बच्चे बिना यूनिफॉर्म या अधूरी ड्रेस में स्कूल पहुंचते हैं। मंत्री का मानना है कि अगर बच्चों को सीधे यूनिफॉर्म दी जाए, तो यह समस्या अपने आप खत्म हो जाएगी और हर बच्चा सम्मान के साथ स्कूल आ सकेगा।
जीविका मॉडल को स्कूलों तक लाने की तैयारी
सरकार इस नई व्यवस्था के लिए पहले से सफल आंगनबाड़ी मॉडल को आधार बना रही है। फिलहाल बिहार में आंगनबाड़ी केंद्रों पर पढ़ने वाले बच्चों को यूनिफॉर्म जीविका दीदियों द्वारा सिलकर दी जा रही है। यह प्रयोग बड़े पैमाने पर सफल रहा है। इसी अनुभव को देखते हुए अब इसे प्राथमिक स्कूलों तक विस्तार देने की योजना बन रही है। मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि इस मुद्दे पर शिक्षा विभाग के साथ जल्द ही उच्चस्तरीय बातचीत की जाएगी, ताकि योजना को व्यावहारिक रूप दिया जा सके।
आंगनबाड़ी स्तर पर सफल प्रयोग
आंकड़ों के अनुसार, बिहार में इस समय करीब 50 लाख आंगनबाड़ी बच्चों को जीविका समूहों के माध्यम से सिली हुई यूनिफॉर्म दी जा रही है। सरकार का लक्ष्य है कि मार्च तक सभी बच्चों को ड्रेस का वितरण पूरा कर लिया जाए। इस व्यवस्था से यह सुनिश्चित हुआ है कि सभी बच्चे एक जैसी ड्रेस में केंद्रों पर पहुंचें, जिससे समानता और अनुशासन की भावना मजबूत हुई है। अब यही सोच प्राथमिक शिक्षा में भी लागू करने की तैयारी है।
जीविका योजना और महिला सशक्तिकरण
जीविका योजना आज बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। वर्ष 2006 में विश्व बैंक के सहयोग से शुरू हुई यह योजना अब राज्य की लाखों महिलाओं को आत्मनिर्भर बना चुकी है। वर्तमान में जीविका से जुड़े स्वयं सहायता समूहों की संख्या 11 लाख से अधिक है और इससे करीब 1.4 करोड़ महिलाएं जुड़ी हुई हैं। सरकार ने स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए 1.54 करोड़ से ज्यादा जीविका दीदियों को 10,000 रुपये की सहायता भी दी थी, जिससे हजारों महिलाओं ने सिलाई मशीन खरीदी।
ड्रेस निर्माण से जुड़ता रोजगार
आज बिहार में जीविका के तहत करीब 1,050 सिलाई केंद्र संचालित हो रहे हैं। इन केंद्रों के जरिए लगभग एक लाख महिलाएं स्कूल और आंगनबाड़ी की यूनिफॉर्म सिलने के काम से जुड़ी हुई हैं। सरकार का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में यह संख्या बढ़कर 5 लाख से अधिक हो सकती है। अगर प्राथमिक स्कूलों की यूनिफॉर्म भी इसी मॉडल से तैयार होने लगे, तो ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खुलेंगे।
शिक्षा और सम्मान का सवाल
सरकार का मानना है कि यूनिफॉर्म केवल कपड़ा नहीं, बल्कि बच्चों के सम्मान और आत्मविश्वास से जुड़ा विषय है। जब बच्चे एक जैसी साफ-सुथरी ड्रेस में स्कूल जाते हैं, तो उनके भीतर बराबरी की भावना विकसित होती है। इससे पढ़ाई के माहौल पर भी सकारात्मक असर पड़ता है। नकद राशि देने की व्यवस्था में यह गारंटी नहीं रहती कि बच्चा वास्तव में यूनिफॉर्म में ही स्कूल पहुंचे।
समाज कल्याण विभाग का अनुभव
इस कार्यक्रम में समाज कल्याण मंत्री मदन सहनी ने भी आंगनबाड़ी स्तर पर हुए बदलावों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि दूध, अंडा और यूनिफॉर्म जैसी सुविधाओं से बच्चों में समानता की भावना बढ़ी है और पोषण स्तर में भी सुधार हुआ है। नियमित भोजन और बेहतर देखभाल के कारण कुपोषण पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया है। यही अनुभव स्कूल स्तर पर भी उपयोगी साबित हो सकता है।
गुणवत्ता पर विशेष जोर
सरकार इस बात को लेकर भी सजग है कि यूनिफॉर्म की गुणवत्ता से कोई समझौता न हो। इसके लिए सिलाई कार्य की निगरानी, गुणवत्ता जांच और समय पर वितरण को लेकर नए डिजिटल टूल और ट्रेनिंग मैनुअल तैयार किए गए हैं। जीविका दीदियों को नियमित प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि ड्रेस की फिटिंग, कपड़े की मजबूती और डिजाइन में एकरूपता बनी रहे।
आगे की राह
फिलहाल यह प्रस्ताव विचार के स्तर पर है, लेकिन इसके संकेत साफ हैं कि बिहार सरकार शिक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता को एक साथ जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रही है। यदि यह योजना लागू होती है, तो प्राथमिक स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों बच्चों को सीधे यूनिफॉर्म मिलेगी और ग्रामीण महिलाओं को स्थायी रोजगार का सहारा मिलेगा। यूनिफॉर्म की नकद राशि खत्म कर जीविका दीदियों के माध्यम से ड्रेस वितरण की यह पहल सिर्फ शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बदलाव की भी कोशिश है। यह कदम बच्चों को समान अवसर देने के साथ-साथ महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक मजबूत प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा है।


