बांग्लादेश में हिंदू व्यवसायी पर हमला, इलाज के दौरान अस्पताल में दर्दनाक मौत
नई दिल्ली। बांग्लादेश में फरवरी 2026 में होने वाले आम चुनावों से पहले देश का माहौल लगातार अशांत होता जा रहा है। चुनावी सरगर्मी के बीच सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं बढ़ती दिख रही हैं, जिनका सबसे अधिक असर अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर हिंदुओं पर पड़ रहा है। ताजा मामला शरीयतपुर जिले से सामने आया है, जहां एक हिंदू व्यवसायी की बर्बर हमले के बाद इलाज के दौरान मौत हो गई। इस घटना ने न सिर्फ बांग्लादेश, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
घटना का पूरा विवरण
शरीयतपुर जिले के दामुड्या इलाके में रहने वाले खोकन चंद्र दास पेशे से व्यवसायी थे। वे दवा और मोबाइल बैंकिंग की एक छोटी दुकान चलाकर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे थे। नए साल की पूर्व संध्या पर बुधवार रात जब वह अपनी दुकान बंद कर ऑटो-रिक्शा से घर लौट रहे थे, तभी केउरभांगा बाजार के पास अचानक हालात बदल गए। वहां मौजूद दंगाइयों की एक भीड़ ने उनका रास्ता रोक लिया और बिना किसी उकसावे के उन पर हमला कर दिया।
हमलावरों की बर्बरता
प्रत्यक्षदर्शियों और परिजनों के अनुसार, हमलावरों ने पहले खोकन चंद्र दास पर धारदार हथियारों से हमला किया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बाद भीड़ ने उन पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी। यह हमला इतना अचानक और निर्मम था कि खोकन को संभलने का मौका तक नहीं मिला। जान बचाने के प्रयास में वह पास के एक तालाब में कूद गए, जिससे आग तो बुझ गई, लेकिन तब तक उनका शरीर काफी हद तक झुलस चुका था।
इलाज के दौरान मौत
घटना के बाद गंभीर रूप से घायल खोकन चंद्र दास को अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने उनकी जान बचाने की भरसक कोशिश की, लेकिन उनकी हालत लगातार नाजुक बनी रही। कई दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करने के बाद आखिरकार इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। उनकी मौत की खबर फैलते ही इलाके में शोक और आक्रोश का माहौल बन गया।
परिवार का दर्द और आरोप
खोकन चंद्र दास की पत्नी सीमा दास का कहना है कि यह हमला केवल हिंसा नहीं, बल्कि सुनियोजित हत्या थी। उनका आरोप है कि उनके पति ने हमलावरों को पहचान लिया था, इसी कारण उन्हें जिंदा जलाकर मारने की कोशिश की गई। परिवार का कहना है कि खोकन किसी से दुश्मनी नहीं रखते थे और एक शांतिप्रिय व्यक्ति थे। इस घटना ने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया है और उनके सामने आजीविका का भी गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
चुनाव से पहले बढ़ती हिंसा
बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव होने हैं। चुनावों की घोषणा के बाद से ही देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा है। अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ हिंसा की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। इससे पहले 18 दिसंबर को मयमनसिंह में दीपू चंद्र दास नामक युवक की मॉब लिंचिंग की घटना हुई थी। पिछले दो हफ्तों में हिंदुओं पर हमले की यह चौथी बड़ी घटना मानी जा रही है, जिसने हालात की गंभीरता को और उजागर कर दिया है।
पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई
दामुड्या थाना पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए दो स्थानीय युवकों, रब्बी और सोहाग, के खिलाफ मामला दर्ज किया है। पुलिस का कहना है कि घटना की जांच जारी है और दोषियों को पकड़ने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि स्थानीय लोगों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि केवल मामला दर्ज करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि हिंसा के पीछे सक्रिय संगठित ताकतों पर भी सख्त कार्रवाई की जरूरत है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
इस घटना पर भारत ने गहरी चिंता व्यक्त की है और इसे अत्यंत गंभीर मामला बताया है। भारत का कहना है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना वहां की सरकार की जिम्मेदारी है। वहीं अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने भी इस हत्या को भयावह बताते हुए बांग्लादेश की अंतरिम सरकार से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है। अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद जमीनी स्तर पर हालात में खास सुधार नजर नहीं आ रहा है।
मानवाधिकार संगठनों की चेतावनी
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि चुनाव से पहले कट्टरपंथी ताकतें जानबूझकर डर और ध्रुवीकरण का माहौल बना रही हैं। उनका दावा है कि अल्पसंख्यकों पर हमले केवल व्यक्तिगत घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं, ताकि समाज में अस्थिरता फैलाई जा सके। संगठनों ने अंतरिम सरकार से निष्पक्ष जांच और पीड़ित परिवारों को सुरक्षा देने की मांग की है।
हिंसा के साये में चुनाव
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने इन घटनाओं की निंदा जरूर की है, लेकिन हिंसा का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। खोकन चंद्र दास की मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या चुनाव से पहले देश में कानून-व्यवस्था पूरी तरह नियंत्रण में है। अल्पसंख्यक समुदाय के बीच भय का माहौल गहराता जा रहा है और लोग अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। यह घटना बांग्लादेश के लोकतांत्रिक और सामाजिक ताने-बाने के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर सामने आई है।


