पटना से 6 राज्यों के लिए जल्द शुरू होगी बस सेवा, 60 से अधिक बसों का होगा परिचालन
पटना। बिहार की राजनीति और प्रशासन में अब कनेक्टिविटी एक अहम मुद्दा बनता जा रहा है। लंबे समय से ट्रेन की भीड़, कन्फर्म टिकट की समस्या और वेटिंग लिस्ट से परेशान बिहारवासियों के लिए राज्य सरकार ने सड़क परिवहन के क्षेत्र में बड़ा फैसला लिया है। अब लोगों को दूसरे राज्यों में जाने के लिए केवल रेलवे पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा, बल्कि बसों के जरिए भी उन्हें सीधी और सुविधाजनक यात्रा का विकल्प मिलेगा। इस फैसले को आम जनता की जरूरतों से जोड़कर देखा जा रहा है।
6 राज्यों और 60 से अधिक शहरों से सीधा जुड़ाव
परिवहन विभाग की योजना के अनुसार पटना से छह राज्यों और 60 से अधिक शहरों के लिए सीधी बस सेवा शुरू की जाएगी। इसके तहत 60 से अधिक बसों का नियमित परिचालन होगा। यह कदम बिहार को देश के अलग-अलग हिस्सों से सड़क मार्ग के जरिए जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि राजधानी पटना को एक बड़े बस ट्रांजिट हब के रूप में विकसित किया जाए, जहां से विभिन्न राज्यों के लिए सीधी बसें उपलब्ध हों।
परिवहन मंत्री की घोषणा और रणनीति
इस योजना के केंद्र में बिहार के परिवहन मंत्री श्रवण कुमार हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि 50 हजार से अधिक आबादी वाले प्रखंडों को हर हाल में बस सुविधा से जोड़ा जाएगा। उनका मानना है कि अगर जिलों और प्रखंडों से सीधे बसें चलेंगी, तो लोगों को राजधानी या बड़े शहरों तक पहुंचने में होने वाली परेशानी कम होगी। इससे आम जनता का समय और पैसा दोनों बचेगा।
अगले दो महीनों में 150 नई बसें
सरकार की योजना यहीं तक सीमित नहीं है। अगले दो महीनों के भीतर 150 नई बसें सड़कों पर उतारने की तैयारी की जा रही है। इन बसों के जरिए न सिर्फ अंतरराज्यीय, बल्कि अंतरजिला कनेक्टिविटी को भी मजबूत किया जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि बसों की संख्या बढ़ने से यात्रियों को अधिक विकल्प मिलेंगे और भीड़ का दबाव भी कम होगा।
पीपीपी मॉडल पर आधारित व्यवस्था
इस पूरी योजना की सबसे खास बात यह है कि इसे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल पर लागू किया जा रहा है। परिवहन विभाग ने करीब 650 बसों को पीपीपी मोड में चलाने के लिए निजी बस मालिकों से आवेदन मांगे हैं। पहले से ही लगभग 1200 बसें इसी मॉडल के तहत संचालित हो रही हैं। इस व्यवस्था से सरकार पर वित्तीय बोझ कम पड़ता है और निजी क्षेत्र की भागीदारी से सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार की उम्मीद की जा रही है।
ट्रेन पर निर्भरता होगी कम
परिवहन विशेषज्ञों का मानना है कि बड़ी संख्या में बसों के संचालन से ट्रेनों पर यात्रियों की निर्भरता स्वाभाविक रूप से कम होगी। खासकर त्योहारों और छुट्टियों के दौरान जब ट्रेनों में अत्यधिक भीड़ होती है, तब बसें एक बेहतर विकल्प बन सकती हैं। इससे रेलवे पर दबाव भी घटेगा और यात्रियों को वैकल्पिक साधन मिलेंगे। राजनीतिक दृष्टि से भी यह फैसला सरकार के लिए फायदेमंद माना जा रहा है।
किन राज्यों के लिए कितनी बसें
परिवहन विभाग के प्रस्ताव के अनुसार सबसे ज्यादा बसें झारखंड के लिए चलाई जाएंगी, जिनकी संख्या करीब 90 होगी। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के लिए 34, पश्चिम बंगाल के लिए 45, ओडिशा के लिए 16, छत्तीसगढ़ के लिए 28 और दिल्ली के लिए 10 बसें प्रस्तावित हैं। इन बसों के जरिए बिहार के लोगों को सीधे बड़े शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों तक पहुंचने में आसानी होगी।
एसी, नॉन एसी और लग्जरी बसों की तैयारी
सरकार ने बसों की श्रेणी पर भी खास ध्यान दिया है। प्रस्तावित योजना के तहत 400 नॉन एसी, 200 एसी और 50 लग्जरी बसें चलाई जाएंगी। इससे यात्रियों को अपनी सुविधा और बजट के अनुसार विकल्प चुनने का मौका मिलेगा। खासकर लंबी दूरी की यात्राओं के लिए एसी और लग्जरी बसों की मांग को ध्यान में रखा गया है।
बिहार-नेपाल बस सेवा की चर्चा
इस योजना के तहत बिहार और नेपाल के बीच लग्जरी बस सेवा शुरू करने की तैयारी भी चर्चा में है। अगर यह योजना धरातल पर उतरती है, तो सीमावर्ती इलाकों के लोगों को काफी फायदा मिलेगा। इससे न सिर्फ आवागमन आसान होगा, बल्कि व्यापार और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है।
विकास और राजनीति का नया संकेत
यह फैसला केवल परिवहन सुधार तक सीमित नहीं माना जा रहा है। इसे जनता से सीधे जुड़ाव और विकास की राजनीति के रूप में देखा जा रहा है। सड़क परिवहन को मजबूत कर सरकार यह संदेश देना चाहती है कि बुनियादी सुविधाओं में सुधार उसकी प्राथमिकता है। आने वाले समय में यह योजना चुनावी राजनीति में भी एक बड़ा मुद्दा बन सकती है। पटना से छह राज्यों के लिए बस सेवा शुरू करने का फैसला बिहार के परिवहन तंत्र में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। इससे आम लोगों को राहत मिलेगी, यात्रा सुगम होगी और राज्य की कनेक्टिविटी को नई दिशा मिलेगी। अब बिहार की सड़कें केवल सफर का माध्यम नहीं रहेंगी, बल्कि सरकार की नीतियों और नीयत का प्रतिबिंब भी बनेंगी।


