अखिलेश यादव का चुनाव आयोग पर बड़ा हमला, बोले- भाजपा से मिलीभगत कर वोट काटने की साजिश, सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी माहौल लगातार गरमाता जा रहा है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग और भारतीय जनता पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि मतदाता सूची से लोगों के नाम हटाने की साजिश रची जा रही है और इसमें चुनाव आयोग तथा भाजपा की मिलीभगत है। अखिलेश यादव ने इस पूरे मामले में सर्वोच्च न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग करते हुए इसे लोकतंत्र और संविधान के लिए गंभीर खतरा बताया है।
मतदाता सूची संशोधन को लेकर उठे सवाल
उत्तर प्रदेश में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची को अद्यतन करने का कार्य किया जा रहा है। इस प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने की कार्रवाई भी शामिल होती है। इसी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष ने सवाल खड़े किए हैं। समाजवादी पार्टी का आरोप है कि इस अभियान के जरिए एक खास वर्ग के मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की जा रही है, जिससे चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकता है। अखिलेश यादव ने कहा कि मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया जा रहा है और यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास है। उन्होंने इस मामले को बेहद गंभीर बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है।
सर्वोच्च न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग
अखिलेश यादव ने सामाजिक माध्यम मंच एक्स पर एक वीडियो साझा करते हुए सर्वोच्च न्यायालय से इस मामले में तत्काल संज्ञान लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि देश में लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप बेहद जरूरी हो गया है। उनके अनुसार अब अन्य संस्थाओं से निष्पक्ष न्याय की उम्मीद कम होती दिख रही है। उन्होंने विशेष रूप से मतदाता सूची से नाम हटाने से जुड़े प्रपत्र सात के दुरुपयोग पर रोक लगाने की मांग की है। अखिलेश का कहना है कि इस प्रपत्र के जरिए लोगों के मतदान अधिकार को प्रभावित किया जा रहा है। उन्होंने यह भी मांग की कि जब तक इस प्रक्रिया के लिए पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवस्था नहीं बनाई जाती, तब तक इस प्रपत्र के इस्तेमाल पर रोक लगाई जानी चाहिए।
प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव का आरोप
समाजवादी पार्टी प्रमुख ने आरोप लगाया कि क्षेत्र स्तर के अधिकारियों और बूथ स्तर के कर्मचारियों पर दबाव बनाकर मतदाताओं के नाम हटाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि किसी कर्मचारी पर इस तरह का दबाव डाला जा रहा है, तो उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर त्वरित न्यायालय में सुनवाई की जानी चाहिए। अखिलेश यादव ने यह भी आरोप लगाया कि मतदाता सूची से जुड़े दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया को भी राजनीतिक रूप से प्रभावित किया जा रहा है। उन्होंने मांग की कि इस पूरी गतिविधि पर तत्काल रोक लगाई जाए और अब तक जमा किए गए सभी प्रपत्रों की निष्पक्ष जांच कर उन्हें निरस्त किया जाए।
षड्यंत्र की जांच की मांग
अखिलेश यादव ने अपने बयान में यह भी कहा कि मतदाताओं के नाम हटाने के पीछे यदि कोई देश विरोधी ताकतें सक्रिय हैं, तो उनकी न्यायिक जांच कराई जानी चाहिए। उन्होंने देश के ईमानदार अधिकारियों और पत्रकारों से अपील की कि वे इस मामले की सच्चाई सामने लाने में सहयोग करें। उन्होंने अपने समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं से भी अपील की कि वे प्रत्येक वैध मतदाता का नाम सूची में सुरक्षित रखने के लिए सक्रिय रूप से काम करें। अखिलेश यादव का कहना है कि विपक्ष की बढ़ती ताकत से घबराकर इस प्रकार की साजिशें रची जा रही हैं।
बूथ स्तर अधिकारी के आरोप से बढ़ा विवाद
इस विवाद के बीच एक बूथ स्तर अधिकारी अश्वनी कुमार का बयान भी चर्चा में आ गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि उन पर कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा दबाव बनाया गया कि एक विशेष समुदाय के मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाएं। अधिकारी ने यह भी दावा किया कि ऐसा करने से इनकार करने पर उनके साथ मारपीट और अभद्र व्यवहार किया गया। हालांकि पुलिस प्रशासन ने इस मामले को लेकर अलग बयान दिया है। पुलिस का कहना है कि दोनों पक्षों के बीच मतदाता सूची से जुड़े प्रपत्र जमा करने को लेकर गलतफहमी के कारण विवाद हुआ था। पुलिस के अनुसार मामले की जांच की जा रही है और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई की जाएगी।
राजनीतिक माहौल हुआ गर्म
मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर चल रहे इस विवाद ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है। विपक्ष लगातार सरकार और चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है, जबकि सत्तारूढ़ पक्ष इन आरोपों को निराधार बता रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आगामी चुनावों को देखते हुए यह मुद्दा और भी महत्वपूर्ण बन सकता है। फिलहाल इस पूरे मामले पर चुनाव आयोग की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं सर्वोच्च न्यायालय के संभावित हस्तक्षेप को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस विवाद के और गहराने की संभावना जताई जा रही है।


