February 25, 2026

2006 मुंबई ट्रेन विस्फोट: एटीएस ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती, 24 को होगी सुनवाई

मुंबई। 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इन सात विस्फोटों में 180 से अधिक लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। ये धमाके मुंबई की पश्चिमी रेलवे लाइन पर यात्रा कर रही लोकल ट्रेनों में हुए थे। घटना के बाद महाराष्ट्र की आतंकवाद निरोधक दस्ता (एटीएस) ने जांच करते हुए 12 लोगों को आरोपित बनाया था।
हाईकोर्ट का फैसला
हाल ही में बंबई उच्च न्यायालय ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सभी 12 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोप सिद्ध करने में विफल रहा है। गवाहों के बयान, आरोपियों के इकबालिया बयान और कथित रूप से की गई बरामदगी में कोई साक्ष्य मूल्य नहीं था। न्यायालय ने यहां तक कहा कि अभियोजन का पूरा मामला संदेहास्पद और अपूर्ण था, इसलिए आरोपियों को दोषी ठहराना संभव नहीं है।
इकबालिया बयानों पर सवाल
हाईकोर्ट ने आरोपियों के दिए गए इकबालिया बयानों को नकल प्रतीत होने वाला बताते हुए अस्वीकार कर दिया। अदालत ने माना कि ये बयान संभवतः प्रताड़ना के जरिए लिए गए थे और इनकी वैधता संदेह के घेरे में है। साथ ही यह भी कहा कि इन बयानों के आधार पर किसी को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा।
मकोका कानून पर भी सवाल
अदालत ने महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के तहत दी गई मंजूरी को भी ‘बिना सोच-समझ के’ और ‘यांत्रिक ढंग’ से लिया गया निर्णय बताया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में मकोका के प्रावधानों को लागू करना उचित नहीं था।
सरकार का रुख और सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
महाराष्ट्र सरकार ने बंबई हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सरकार का तर्क है कि उनके पास पुख्ता सबूत हैं, और हाईकोर्ट का निर्णय पीड़ितों को न्याय देने में असफल रहा है। उनका मानना है कि दोषियों को बरी करने से न केवल कानून व्यवस्था पर प्रश्न उठता है, बल्कि इससे पीड़ितों के परिवारों की पीड़ा और बढ़ती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई के लिए 24 जुलाई की तारीख तय की है।
अदालत की टिप्पणी और सामाजिक असर
हाईकोर्ट ने 671 पन्नों के विस्तृत फैसले में यह भी कहा कि किसी अपराध के वास्तविक दोषियों को सजा देना ही न्याय है। लेकिन यदि दोषी नहीं हैं, तो केवल दिखावे के लिए किसी को सजा देना समाज में झूठी संतुष्टि का माहौल पैदा करता है और असली अपराधी आज़ाद घूमते रहते हैं। यह जनता के विश्वास को कमजोर करता है।
विशेष अदालत का पुराना फैसला
2015 में एक विशेष अदालत ने इस मामले में 12 लोगों को दोषी ठहराया था। इनमें से पांच को मृत्युदंड और सात को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। बरी किए गए लोगों में से एक, कमाल अंसारी की मृत्यु अपील की सुनवाई के दौरान हो चुकी है। मुंबई ट्रेन धमाके जैसे गंभीर मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और साक्ष्य की ठोसता बेहद आवश्यक होती है। इस मामले में न्यायालय ने अभियोजन की कमजोरी और साक्ष्यों की कमी को आधार बनाकर फैसले को सुनाया। अब सुप्रीम कोर्ट में सरकार द्वारा दायर अपील पर 24 जुलाई को सुनवाई होगी, जिससे यह स्पष्ट होगा कि इस फैसले पर पुनर्विचार की कोई संभावना है या नहीं। यह मामला न केवल न्याय व्यवस्था की परख है, बल्कि पीड़ितों और समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।

You may have missed