मंत्री से प्रोफेसर बने अशोक चौधरी, एएन कॉलेज में लिया राजनीति विज्ञान का क्लास

  • जिस भवन का निर्माण कराया, उसी में पढ़ाने पहुंचे मंत्री; लंबे अंतराल के बाद कक्षा लेने पर जताई उत्सुकता
  • सहायक प्राध्यापक पद पर चयन, नियुक्ति स्वीकार करने पर सेवा नियमों को लेकर उठे सवाल

पटना। एएन कॉलेज में बुधवार को एक अनोखा दृश्य देखने को मिला, जब बिहार सरकार के ग्रामीण कार्य मंत्री अशोक चौधरी ने राजनीति विज्ञान विषय का क्लास लिया। खास बात यह रही कि जिस भवन का निर्माण उन्होंने मंत्री रहते हुए कराया था, उसी भवन में वे अब शिक्षक की भूमिका में छात्रों को पढ़ाते नजर आए। क्लास लेने से पहले अशोक चौधरी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि यह उनके लिए एक विशेष अनुभव है। उन्होंने बताया कि बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जो मंत्री रहते हुए शिक्षक के रूप में कक्षा लेते हैं। उन्होंने कहा कि वे केवल पढ़ाने ही नहीं, बल्कि छात्रों से सीखने भी आए हैं। भवन को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने इसे भगवान महादेव का आशीर्वाद बताया और कहा कि यह उनके जीवन का एक खास क्षण है। उन्होंने बताया कि उन्होंने वर्ष 1991 में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की थी और अब 2026 में उन्हें फिर से पढ़ाने का अवसर मिला है। इतने लंबे अंतराल के बाद कक्षा लेने को लेकर उन्होंने थोड़ी घबराहट और उत्सुकता भी व्यक्त की। अशोक चौधरी ने स्वीकार किया कि उन्होंने लंबे समय से राजनीति विज्ञान की पढ़ाई नियमित रूप से नहीं की है, जिससे पढ़ाना उनके लिए एक चुनौती है। हालांकि उन्होंने विभागाध्यक्ष से पाठ्यक्रम प्राप्त कर पहले ही तैयारी कर ली थी और उसी आधार पर छात्रों को पढ़ाया। दरअसल, बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग द्वारा आयोजित चयन प्रक्रिया में अशोक चौधरी का चयन सहायक प्राध्यापक के पद पर हुआ है। उन्होंने राजनीति विज्ञान विषय में अनुसूचित जाति श्रेणी के अंतर्गत सफलता प्राप्त की है। आयोग ने हाल ही में इस बहाली प्रक्रिया का अंतिम परिणाम जारी किया है। गौरतलब है कि राज्य में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया वर्ष 2020 में शुरू हुई थी। विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में रिक्त पदों को भरने के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। लगभग चार वर्षों के बाद इस प्रक्रिया का परिणाम सामने आया है। अशोक चौधरी की वर्तमान आयु 58 वर्ष है और वे राज्य सरकार में महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं। वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी सहयोगियों में गिने जाते हैं। ऐसे में उनके सहायक प्राध्यापक के रूप में चयन ने राजनीतिक और शैक्षणिक दोनों ही क्षेत्रों में चर्चा पैदा कर दी है। अब यह महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या वे इस पद को औपचारिक रूप से स्वीकार करेंगे या नहीं। यदि वे इस पद को ग्रहण करते हैं, तो उन्हें सरकारी सेवा के नियमों के तहत मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है या फिर विशेष अनुमति प्राप्त करनी होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला सेवा नियमों और नैतिकता से भी जुड़ा हुआ है। यदि कोई व्यक्ति एक साथ मंत्री और शिक्षक दोनों की भूमिका निभाना चाहता है, तो इसके लिए स्पष्ट नियमों और अनुमति की आवश्यकता होती है। यदि अशोक चौधरी इस पद को स्वीकार नहीं करते हैं, तो यह सीट रिक्त मानी जाएगी और इसे आगामी बहाली प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा। फिलहाल, एएन कॉलेज में उनका क्लास लेना छात्रों के लिए एक नया अनुभव रहा। छात्रों ने भी इस पहल को सकारात्मक रूप से लिया और मंत्री के रूप में उनकी मौजूदगी के साथ-साथ शिक्षक के रूप में उनके अनुभव से सीखने का अवसर प्राप्त किया। यह घटना शिक्षा और राजनीति के बीच एक अनोखा संगम प्रस्तुत करती है, जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि अशोक चौधरी आगे किस भूमिका को प्राथमिकता देते हैं।

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