झारखंड में सरकार बनाने की तैयारी में एनडीए, बीजेपी और जेएमएम में गठबंधन, कांग्रेस के दावे से मचा हड़कंप
रांची। झारखंड में निकाय चुनाव के बीच सियासी हलचल तेज हो गई है। भले ही यह चुनाव औपचारिक रूप से गैर-दलगत आधार पर हो रहे हों, लेकिन राज्य की सभी प्रमुख पार्टियां पर्दे के पीछे अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटी हैं। विधानसभा चुनाव के बाद अब शहरों की सत्ता पर पकड़ बनाने की होड़ मची हुई है। इसी माहौल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री केएन त्रिपाठी के एक बयान ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।
कांग्रेस नेता का बड़ा दावा
केएन त्रिपाठी ने दावा किया है कि निकाय चुनाव के बाद झारखंड की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। उनका कहना है कि बीजेपी और जेएमएम के बीच गठबंधन लगभग तय हो चुका है और इसके बाद राज्य में एनडीए की सरकार बन सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि अगले 15 से 20 दिनों में इस गठबंधन की औपचारिक घोषणा संभव है। त्रिपाठी ने अपने बयान में यह भी संकेत दिया कि इस संभावित समझौते को केंद्रीय स्तर पर भी मंजूरी मिल चुकी है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी इस प्रस्ताव को हरी झंडी मिल गई है। हालांकि उन्होंने इस दावे के समर्थन में कोई दस्तावेज या ठोस प्रमाण पेश नहीं किया।
बीजेपी ने किया खंडन
कांग्रेस नेता के इस बयान पर बीजेपी की ओर से तुरंत प्रतिक्रिया आई। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने ऐसे किसी भी गठबंधन की संभावना से साफ इनकार किया। उन्होंने कहा कि बीजेपी पूरी ताकत से निकाय चुनाव और भविष्य की राजनीतिक रणनीति पर काम कर रही है और किसी तरह के समझौते की बात निराधार है। मरांडी ने राज्य की मौजूदा सरकार पर भी निशाना साधा। उनका कहना था कि एक साल के कार्यकाल में सरकार कोई ठोस उपलब्धि नहीं दिखा पाई है। उन्होंने आरोप लगाया कि जनता को सिर्फ वादों और सपनों के सहारे रखा गया है, जबकि जमीनी स्तर पर विकास कार्यों की रफ्तार धीमी है। मरांडी ने यह भी कहा कि जब सरकार की प्राथमिकता निजी लाभ हो, तो सरकारी खजाना खाली होना तय है और इसका सीधा असर विकास योजनाओं पर पड़ता है।
मौजूदा गठबंधन की स्थिति
फिलहाल झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में जेएमएम, कांग्रेस, राजद और वामदलों की गठबंधन सरकार चल रही है। यह गठबंधन विधानसभा चुनाव के बाद बना था और अभी तक सत्ता में बना हुआ है। हालांकि हाल के महीनों में सहयोगी दलों के बीच मतभेद की खबरें सामने आती रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन मतभेदों की शुरुआत बिहार चुनाव के दौरान हुई थी। उस समय जेएमएम महागठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहती थी, लेकिन राजद ने सीट बंटवारे को लेकर सहमति नहीं जताई। इसके बाद से रिश्तों में खटास की चर्चा तेज हो गई।
मंच से दूरी, बढ़ी अटकलें
बताया जा रहा है कि हाल के सार्वजनिक कार्यक्रमों में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मंच पर कांग्रेस और राजद के कुछ विधायकों को जगह नहीं दी जा रही है। इस घटनाक्रम ने सियासी गलियारों में तरह-तरह की अटकलों को जन्म दिया है। विपक्षी दल इसे गठबंधन में दरार का संकेत बता रहे हैं, जबकि सत्तारूढ़ दल इसे सामान्य राजनीतिक स्थिति करार दे रहे हैं। हालांकि अभी तक गठबंधन टूटने या किसी नए समीकरण की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। बावजूद इसके, निकाय चुनाव के नतीजों को राज्य की भविष्य की राजनीति के संकेतक के रूप में देखा जा रहा है।
निकाय चुनाव का बढ़ता महत्व
झारखंड में निकाय चुनाव भले ही सीधे तौर पर दलगत आधार पर नहीं हो रहे, लेकिन सभी राजनीतिक दल अपने समर्थित उम्मीदवारों के जरिए स्थानीय निकायों में प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। शहरों की सत्ता पर पकड़ भविष्य की विधानसभा राजनीति को भी प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि चुनावी मुकाबले को बेहद अहम माना जा रहा है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि निकाय चुनाव के परिणाम किसी एक दल या समूह के पक्ष में झुकते हैं, तो इससे सत्ता समीकरणों पर असर पड़ सकता है। ऐसे में कांग्रेस नेता का दावा और बीजेपी का खंडन दोनों ही राज्य की राजनीति में हलचल बढ़ा रहे हैं।
राज्य में सियासी तापमान बढ़ा
फिलहाल स्थिति अटकलों और बयानों तक सीमित है। बीजेपी ने जहां गठबंधन की बात को सिरे से खारिज किया है, वहीं कांग्रेस नेता अपने दावे पर कायम हैं। जेएमएम की ओर से भी इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। निकाय चुनाव के नतीजों के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि झारखंड की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी। फिलहाल राज्य में सियासी तापमान लगातार बढ़ रहा है और आने वाले दिनों में राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।


