बिहार में शराबबंदी पर सियासी संग्राम तेज, मांझी और तेजस्वी के बीच आरोप-प्रत्यारोप

  • मांझी बोले- लागू करने में खामियां, गरीब ही बन रहे निशाना
  • तेजस्वी का दावा, अवैध कारोबार से 40 हजार करोड़ की समानांतर काली अर्थव्यवस्था

पटना। बिहार में लागू पूर्ण शराबबंदी एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। एक ओर विपक्ष इस कानून की विफलता पर सवाल उठा रहा है, तो दूसरी ओर सत्तापक्ष इसके क्रियान्वयन में खामियों को स्वीकार करते हुए विपक्ष पर ही आरोप लगा रहा है। इसी क्रम में केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी  यादव के बीच तीखी बयानबाजी सामने आई है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि शराबबंदी नीति अपने आप में सही है, लेकिन इसके लागू करने में गंभीर गड़बड़ियां हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कानून के तहत सबसे ज्यादा कार्रवाई गरीब तबके के लोगों पर होती है, जबकि बड़े शराब तस्कर आसानी से बच निकलते हैं। मांझी के अनुसार, लाखों मामले गरीब लोगों के खिलाफ दर्ज किए गए हैं, जिससे यह साफ होता है कि कानून का समान रूप से पालन नहीं हो रहा है। मांझी ने यह भी आरोप लगाया कि बड़े स्तर पर अवैध शराब कारोबार से जुड़े लोग राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने बिना नाम लिए विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि कुछ लोग खुद को बचाने के लिए शराबबंदी के खिलाफ बयान देते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह नीति सभी दलों की सहमति से लागू की गई थी, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन में सभी पक्षों का सहयोग जरूरी है। वहीं दूसरी ओर, राजद के नेता तेजस्वी यादव ने शराबबंदी को पूरी तरह विफल करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कानून के नाम पर राज्य में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है और अधिकारियों तथा शराब माफियाओं के बीच सांठगांठ से एक संगठित अवैध तंत्र खड़ा हो गया है। उन्होंने इसे संस्थागत भ्रष्टाचार का उदाहरण बताते हुए कहा कि सरकार के दावे वास्तविकता से काफी दूर हैं। तेजस्वी यादव के अनुसार, शराबबंदी के कारण राज्य में लगभग 40 हजार करोड़ रुपये की समानांतर काली अर्थव्यवस्था विकसित हो चुकी है। उन्होंने कहा कि यह कानून अपने मूल उद्देश्य, यानी शराब की खपत पर रोक और महिलाओं के सशक्तिकरण, को हासिल करने में असफल रहा है। उनके मुताबिक, यदि राज्य में इतनी बड़ी मात्रा में शराब की जब्ती हो रही है, तो यह इस बात का प्रमाण है कि शराब की उपलब्धता अब भी बनी हुई है। उन्होंने आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 5 अप्रैल 2016 को लागू इस कानून के बाद से अब तक 11 लाख से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं और 16 लाख से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसके अलावा राज्यभर में 5 करोड़ लीटर से अधिक शराब जब्त की गई है। तेजस्वी ने सवाल उठाया कि जब इतनी बड़ी मात्रा में शराब पकड़ी जा रही है, तो यह कहां से आ रही है और कैसे राज्य में पहुंच रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शराबबंदी का मुद्दा बिहार की राजनीति में लंबे समय से संवेदनशील रहा है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में लागू इस कानून को सामाजिक सुधार के रूप में पेश किया गया था, खासकर महिलाओं के हितों को ध्यान में रखते हुए। हालांकि समय के साथ इसके क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। वर्तमान स्थिति में यह स्पष्ट है कि शराबबंदी अब केवल सामाजिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बन चुका है। एक ओर सरकार इसे बनाए रखने और सुधारने की बात कर रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष इसकी समीक्षा या बदलाव की मांग कर रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस नीति के क्रियान्वयन में सुधार के लिए क्या कदम उठाती है और क्या इससे जुड़े विवादों पर विराम लग पाता है या नहीं। फिलहाल, बिहार में शराबबंदी को लेकर सियासी घमासान जारी है और दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ जनता के बीच अपनी बात रखने में जुटे हुए हैं।

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