यूआईडीएआई ने शुरू किया एआई आधारित ‘अदृश्य ढाल’ सुरक्षा ढांचा, फर्जी पहचान पर लगेगी रोक
नई दिल्ली। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ने देश के एक अरब से अधिक आधार धारकों की पहचान को सुरक्षित रखने और फर्जी नामांकन पर रोक लगाने के उद्देश्य से कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अगली पीढ़ी का डिजिटल सुरक्षा ढांचा शुरू किया है। ‘अदृश्य ढाल’ नामक इस नई पहल के तहत आधार नामांकन और अद्यतन प्रक्रिया में बायोमेट्रिक सत्यापन की सटीकता को और मजबूत किया गया है, जिससे डुप्लीकेट पहचान बनने की संभावना को समाप्त किया जा सके। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, यह नई प्रणाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संचालित है और तीव्र कंप्यूटिंग तकनीक का उपयोग करके बहुत कम समय में करोड़ों गणनाएं करने में सक्षम है। इस बहुस्तरीय सुरक्षा ढांचे को इस प्रकार विकसित किया गया है कि यह नागरिकों के डेटा की सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित कर सके। इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक नागरिक की विशिष्ट पहचान बनाए रखना और आधार प्रणाली में किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी को रोकना है। यूआईडीएआई वर्तमान में दुनिया की सबसे बड़ी बायोमेट्रिक डुप्लीकेशन जांच प्रणाली का संचालन कर रहा है। इस प्रणाली के तहत प्रत्येक नए आधार नामांकन का मौजूदा आधार डेटाबेस से मिलान किया जाता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि एक ही व्यक्ति के नाम पर एक से अधिक पहचान संख्या जारी न हो। इस प्रक्रिया में उंगलियों के निशान, चेहरे की पहचान और आंखों की पुतली की पहचान जैसी बायोमेट्रिक पद्धतियों का उपयोग किया जाता है। इस सुरक्षा ढांचे को और मजबूत बनाने के लिए यूआईडीएआई ने हैदराबाद स्थित अंतरराष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान के सहयोग से स्वदेशी कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल विकसित किए हैं। ये मॉडल बायोमेट्रिक डेटा की पहचान और सत्यापन में उच्च स्तर की सटीकता प्रदान करते हैं। ये उन्नत प्रणाली उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग ढांचे पर कार्य करती है, जिससे बड़े पैमाने पर डेटा का सुरक्षित विश्लेषण और मिलान संभव हो पाता है। फर्जी नामांकन और दस्तावेज धोखाधड़ी को रोकने के लिए यूआईडीएआई ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित दस्तावेज सत्यापन प्रणाली भी लागू की है। इस प्रणाली के तहत दस्तावेजों के मेटाडेटा का विश्लेषण कर उन्हें प्रमाणिक स्रोतों से सत्यापित किया जाता है। इसके लिए डिजीलॉकर के अनुप्रयोग प्रोग्रामिंग इंटरफेस का उपयोग किया जा रहा है। इससे दस्तावेजों की प्रमाणिकता सुनिश्चित होगी और नामांकन प्रक्रिया अधिक सुरक्षित और तेज होगी। यूआईडीएआई के अनुसार, इस नई प्रणाली से आधार नामांकन और अद्यतन प्रक्रिया में लगने वाला समय कम होगा और सेवा की गुणवत्ता में सुधार होगा। इसके अलावा, डुप्लीकेट पहचान को हटाने और डेटा की सटीकता बनाए रखने में भी मदद मिलेगी। इस तकनीक का उपयोग पहले ही कई राज्यों में सफलतापूर्वक किया जा चुका है और आने वाले महीनों में इसे पूरे देश में लागू किया जाएगा। इस बीच, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डेटा केंद्रों की बढ़ती ऊर्जा और जल आवश्यकताओं को लेकर भी चिंता व्यक्त की जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2028 तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डेटा केंद्रों के लिए शुद्ध पानी की वार्षिक आवश्यकता 1,068 अरब लीटर तक पहुंच सकती है, जो वर्ष 2024 की तुलना में लगभग 11 गुना अधिक है। इसी प्रकार, एक प्रमुख तकनीकी कंपनी की पर्यावरणीय रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 में उसके डेटा केंद्रों को लगभग 23 अरब लीटर शुद्ध पानी की आवश्यकता पड़ी, जो पिछले वर्ष की तुलना में 17 प्रतिशत अधिक थी। विशेषज्ञों के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सर्वर अत्यधिक गर्मी उत्पन्न करते हैं, जिन्हें नियंत्रित करने के लिए कूलिंग टावर प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में पानी का उपयोग होता है, जिसमें से लगभग 80 प्रतिशत पानी वाष्प बनकर वातावरण में चला जाता है। इसके बावजूद, इन तकनीकों का उपयोग डिजिटल सेवाओं की सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक माना जा रहा है। यूआईडीएआई की यह नई पहल देश में डिजिटल पहचान प्रणाली को और अधिक सुरक्षित, विश्वसनीय और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इससे आधार प्रणाली में फर्जीवाड़े की घटनाओं में कमी आएगी और नागरिकों के डेटा की सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी।


