February 19, 2026

बिहार से राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवार उतारेगी एआईएमआईएम, विपक्ष को एक सांसद बनना भी होगा मुश्किल

पटना। देशभर में 37 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव की घोषणा होते ही राजनीतिक दलों की सक्रियता तेज हो गई है। बिहार में भी सियासी माहौल गरमाया हुआ है, जहां राज्यसभा की पांच सीटें खाली हो रही हैं। इन सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर सत्तापक्ष के साथ-साथ विपक्षी दलों में भी रणनीति बनाने का दौर शुरू हो चुका है। इसी बीच ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने साफ कर दिया है कि वह इस बार राज्यसभा चुनाव में सिर्फ समर्थन देने की भूमिका में नहीं रहेगी, बल्कि अपना उम्मीदवार उतारेगी।
एआईएमआईएम का बदला रुख
बिहार विधानसभा की कार्यवाही में शामिल होने पहुंचे एआईएमआईएम विधायक अख्तरुल ईमान ने गुरुवार को इस मुद्दे पर बड़ा बयान देकर सियासी हलचल बढ़ा दी। जब उनसे पूछा गया कि राज्यसभा चुनाव में उनकी पार्टी किस गठबंधन का समर्थन करेगी, तो उन्होंने तीखे अंदाज में जवाब दिया। उन्होंने कहा कि क्या एआईएमआईएम का जन्म सिर्फ दूसरों को समर्थन देने के लिए हुआ है। उन्होंने साफ कहा कि इस बार उनकी पार्टी अपना उम्मीदवार राज्यसभा में भेजने के इरादे से मैदान में उतरेगी।
विपक्ष की रणनीति पर सवाल
अख्तरुल ईमान ने विपक्षी दलों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कई दलों के पहले से राज्यसभा में सांसद हैं, लेकिन एआईएमआईएम की अब तक उच्च सदन में एक भी सीट नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि हर बार वही दल राज्यसभा जाएं और उनकी पार्टी केवल समर्थन देती रहे। उनके बयान से यह संकेत मिला कि एआईएमआईएम अब खुद को सिर्फ सहयोगी दल के रूप में सीमित नहीं रखना चाहती।
उम्मीदवार उतारने का ऐलान
एआईएमआईएम विधायक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनकी पार्टी का भी उम्मीदवार राज्यसभा जाएगा। उन्होंने कहा कि जो लोग फिरकापरस्त सरकार के खिलाफ लड़ना चाहते हैं और जो दलितों, अल्पसंख्यकों और समाज के दबे-कुचले वर्गों के हितों की रक्षा करना चाहते हैं, उन्हें एआईएमआईएम का साथ देना चाहिए। उनका कहना था कि अब वक्त आ गया है कि पार्टी को संसद के उच्च सदन में भी अपनी आवाज मिले।
औवैसी के नेतृत्व को मजबूत करने की अपील
अख्तरुल ईमान ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की भूमिका की भी खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि औवैसी जिस तरह से देशभर में समाज के वंचित वर्गों की आवाज उठा रहे हैं, वह सराहनीय है। उनका कहना था कि देश के किसी भी हिस्से में अगर सांप्रदायिकता या भेदभाव का मामला सामने आता है, तो सबसे पहले औवैसी एक प्रहरी की तरह खड़े नजर आते हैं। ऐसे नेताओं के हाथ मजबूत करना जरूरी है और इसके लिए एआईएमआईएम को समर्थन मिलना चाहिए।
बिहार की पांच सीटों पर मुकाबला
बिहार में राज्यसभा की जिन पांच सीटों पर चुनाव होने हैं, वहां मुकाबला आसान नहीं माना जा रहा। विधानसभा में विधायकों की संख्या को देखते हुए एक सीट जीतने के लिए जरूरी आंकड़ा पहले ही विपक्ष के लिए चुनौती बना हुआ है। ऐसे में एआईएमआईएम के उम्मीदवार उतारने के फैसले से विपक्षी खेमे की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर विपक्षी वोट बंटते हैं, तो एक भी सीट निकालना उनके लिए कठिन हो सकता है।
महागठबंधन के सामने नई चुनौती
एआईएमआईएम के इस रुख से महागठबंधन की रणनीति पर भी असर पड़ सकता है। अब तक कई मौकों पर एआईएमआईएम के विधायक अलग-थलग रहकर फैसले लेते आए हैं। राज्यसभा चुनाव में यदि पार्टी अपना उम्मीदवार उतारती है, तो विपक्षी दलों के बीच समन्वय की कमी खुलकर सामने आ सकती है। इससे महागठबंधन की एकजुटता पर सवाल उठना तय माना जा रहा है।
राजनीतिक संदेश और भविष्य की तैयारी
एआईएमआईएम का यह कदम सिर्फ राज्यसभा चुनाव तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसे आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तैयारी के रूप में भी देखा जा रहा है। पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि वह बिहार की राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान और निर्णायक भूमिका चाहती है। अख्तरुल ईमान के बयान से साफ संकेत मिला है कि पार्टी अब हर चुनाव में अपने हितों को प्राथमिकता देगी।
चुनावी समीकरणों पर असर
राज्यसभा चुनाव आम जनता का सीधा चुनाव नहीं होता, बल्कि विधायकों के जरिए होता है। ऐसे में हर विधायक का समर्थन बेहद अहम होता है। एआईएमआईएम के पास सीमित संख्या में विधायक हैं, लेकिन उनका फैसला चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है। विपक्षी दलों को अब यह तय करना होगा कि वे एआईएमआईएम को साथ लेकर चलें या फिर अलग रास्ता अपनाएं। एआईएमआईएम द्वारा बिहार से राज्यसभा उम्मीदवार उतारने के ऐलान ने सियासी समीकरणों को और जटिल बना दिया है। अख्तरुल ईमान के बयान से यह साफ हो गया है कि पार्टी अब सिर्फ समर्थन की राजनीति नहीं करना चाहती। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस फैसले का राज्यसभा चुनाव और बिहार की व्यापक राजनीति पर क्या असर पड़ता है।

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