February 17, 2026

लालू यादव की जमानत को चुनौती देने वाली याचिका पर अप्रैल में होगी सुनवाई, शीर्ष अदालत पहुंची है सीबीआई

नई दिल्ली। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव से जुड़े बहुचर्चित चारा घोटाले को लेकर एक बार फिर कानूनी हलचल तेज हो गई है। देवघर जिला कोषागार से अवैध निकासी मामले में लालू यादव को मिली सजा के निलंबन को चुनौती देते हुए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। अब इस याचिका पर शीर्ष अदालत में अप्रैल महीने में विस्तृत सुनवाई होने जा रही है। इस घटनाक्रम के बाद एक बार फिर चारा घोटाला देश की राजनीति और न्यायिक बहस के केंद्र में आ गया है।
सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई की याचिका
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने लालू यादव की सजा के निलंबन को लेकर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। एजेंसी का कहना है कि चारा घोटाले जैसे गंभीर आर्थिक अपराध में दोषसिद्धि के बावजूद सजा को निलंबित करना कानूनी रूप से उचित नहीं है। सीबीआई ने तर्क दिया कि इस तरह के मामलों में सजा निलंबन से न्यायिक प्रक्रिया और जनविश्वास दोनों पर असर पड़ता है। मंगलवार को इस याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई हुई, जिसमें अदालत ने संकेत दिया कि इस मामले पर अप्रैल में विस्तार से विचार किया जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि इस घोटाले से जुड़े कई मामले वर्षों से लंबित हैं, जिनका निपटारा अब चरणबद्ध तरीके से किया जाना चाहिए।
न्यायपीठ की टिप्पणी
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की पीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन मामलों में आरोपी की मृत्यु हो चुकी है, उन्हें बंद किया जाएगा। वहीं जिन मामलों में आरोपी जीवित हैं और सजा या सजा निलंबन से जुड़े प्रश्न उठ रहे हैं, उन पर अलग-अलग सुनवाई की जाएगी। अदालत ने यह भी माना कि चारा घोटाला केवल एक मामला नहीं बल्कि कई कोषागारों से जुड़ा हुआ व्यापक घोटाला है, जिसमें अलग-अलग कानूनी पहलुओं पर विचार जरूरी है। इसी कारण से देवघर कोषागार मामले में सीबीआई की याचिका पर अप्रैल में सुनवाई तय करने का संकेत दिया गया है।
देवघर कोषागार मामला क्या है
देवघर जिला कोषागार घोटाला चारा घोटाले का ही एक हिस्सा है। यह मामला वर्ष 1990 से 1994 के बीच देवघर ट्रेजरी से करीब 89 लाख रुपये की कथित अवैध निकासी से जुड़ा है। उस समय पशुपालन विभाग के लिए दवाइयों और पशु चिकित्सा उपकरणों की खरीद के नाम पर करीब 4.7 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। जांच में सामने आया कि फर्जी बिलों और रसीदों के जरिए सरकारी खजाने से बड़ी रकम निकाल ली गई। आरोप है कि उस वक्त राज्य के मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव ने अपने पद का दुरुपयोग किया और जांच से जुड़ी फाइलों को अपने पास रोके रखा, जिससे घोटाले को लंबे समय तक छिपाए रखने में मदद मिली।
लंबी जांच और सजा का सफर
देवघर कोषागार मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंपी गई थी। कई वर्षों तक चली जांच और सुनवाई के बाद वर्ष 2017 में सीबीआई की विशेष अदालत ने लालू यादव को दोषी ठहराया था। अदालत ने उन्हें तीन साल छह महीने की सजा सुनाई थी। हालांकि बाद में उच्च न्यायालय से उन्हें सजा के निलंबन का लाभ मिला, जिसके चलते वे जेल से बाहर हैं। अब इसी सजा निलंबन को सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
चारा घोटाले से जुड़े अन्य मामले
देवघर कोषागार मामला लालू यादव के खिलाफ दर्ज कई मामलों में से एक है। इससे पहले उन्हें चाईबासा ट्रेजरी से अवैध निकासी से जुड़े दो मामलों में सजा सुनाई जा चुकी है। इसके अलावा दुमका ट्रेजरी और डोरंडा कोषागार से जुड़े मामलों में भी अदालत ने उन्हें दोषी करार दिया था। इन सभी मामलों को मिलाकर चारा घोटाला बिहार के सबसे बड़े और चर्चित वित्तीय घोटालों में गिना जाता है। इस घोटाले ने न केवल सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया, बल्कि राज्य की राजनीति को भी पूरी तरह बदल दिया।
राजनीति पर पड़ा गहरा असर
चारा घोटाले का असर बिहार की राजनीति पर लंबे समय तक देखने को मिला। इस मामले में सजा मिलने के बाद लालू यादव को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था। इसके बाद राष्ट्रीय जनता दल की कमान धीरे-धीरे उनके परिवार के अन्य सदस्यों के हाथों में चली गई। यह मामला विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों के लिए हमेशा एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है। जहां एक ओर विपक्ष इसे भ्रष्टाचार का प्रतीक बताता रहा है, वहीं दूसरी ओर राजद समर्थक इसे राजनीतिक साजिश करार देते रहे हैं।
आगे की सुनवाई पर टिकी निगाहें
अब सुप्रीम कोर्ट में अप्रैल में होने वाली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। यदि अदालत सीबीआई की दलीलों को स्वीकार करते हुए सजा निलंबन पर सख्त रुख अपनाती है, तो इसका सीधा असर लालू यादव की कानूनी स्थिति पर पड़ सकता है। वहीं बचाव पक्ष की ओर से यह तर्क दिया जाएगा कि सजा निलंबन कानून के दायरे में दिया गया है और इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। फिलहाल यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में है और सुप्रीम कोर्ट का आगामी फैसला न केवल देवघर कोषागार मामले, बल्कि चारा घोटाले से जुड़े अन्य मामलों की दिशा भी तय कर सकता है।

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