बिहार में इस बार पड़ेगी प्रचंड गर्मी, सूखने लगी गंगा नदी, मौसम पैटर्न में बड़े बदलाव के संकेत
पटना। बिहार में इस साल गर्मी के तेवर समय से पहले ही दिखाई देने लगे हैं। फागुन का महीना चल रहा है, लेकिन मौसम का मिजाज वैशाख-जेठ जैसा महसूस होने लगा है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि गंगा नदी का जलस्तर अभी से घटने लगा है और कई स्थानों पर नदी की धारा शहर के किनारों से दूर खिसकती नजर आ रही है। यह स्थिति आने वाले महीनों में संभावित जल संकट का संकेत मानी जा रही है।
गंगा के जलस्तर में असामान्य गिरावट
आमतौर पर गंगा का जलस्तर अप्रैल-मई के दौरान कम होता है, लेकिन इस बार फरवरी में ही पानी घटने लगा है। स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार बरारी स्थित इंटकवेल को इस वर्ष पहले की तुलना में करीब 100 फीट आगे अतिरिक्त पाइप लगाकर गंगा की धारा से पानी लेना पड़ रहा है। पिछले साल फरवरी में जहां से पानी मिल रहा था, इस बार वह स्थान सूख चुका है या वहां पानी काफी कम हो गया है। यह बदलाव केवल एक तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि नदी की धारा के पीछे हटने का संकेत है। इंटकवेल प्रशासन ने एहतियातन अतिरिक्त पाइप मंगाने की तैयारी शुरू कर दी है, ताकि गर्मी बढ़ने पर पेयजल आपूर्ति बाधित न हो।
पेयजल संकट की आशंका
गंगा के जलस्तर में गिरावट का सीधा असर शहरी और ग्रामीण पेयजल आपूर्ति पर पड़ सकता है। लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए विभिन्न इलाकों से भूजल स्तर की रिपोर्ट तलब की है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो गर्मी के चरम पर पहुंचते-पहुंचते हालात और बिगड़ सकते हैं। कार्यपालक अभियंता ने बताया कि कनिष्ठ अभियंताओं को साप्ताहिक निगरानी के निर्देश दिए गए हैं। हर सप्ताह भूजल स्तर का आकलन कर रिपोर्ट देने को कहा गया है, ताकि किसी भी अचानक आई गिरावट को समय रहते पकड़ा जा सके।
ग्रामीण इलाकों में भी दिख रहा असर
गर्मी के शुरुआती संकेत ग्रामीण इलाकों में भी नजर आने लगे हैं। पशुपालकों का कहना है कि इस वर्ष फरवरी में ही मवेशियों में ज्यादा प्यास और भूख में कमी जैसे लक्षण दिखाई देने लगे हैं। आमतौर पर ऐसे लक्षण भीषण गर्मी के दौरान सामने आते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह असामान्य तापमान वृद्धि का संकेत हो सकता है। यदि मार्च और अप्रैल में भी यही स्थिति बनी रही तो इस वर्ष तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है।
भूजल स्तर पर भी खतरे के संकेत
केंद्रीय भूजल बोर्ड की प्री-मानसून बुलेटिन में पहले ही चेतावनी दी जा चुकी है कि भागलपुर और गंगा किनारे बसे कई शहरों व गांवों में भूजल स्तर गिर रहा है। विभागीय सूत्रों के अनुसार जनवरी और फरवरी में किए गए स्थलीय निरीक्षण में भी जलस्तर में गिरावट की पुष्टि हुई है। सभी प्रखंडों का जलस्तर रिकॉर्ड किया जा रहा है और विस्तृत रिपोर्ट मई या जून में जारी होने की संभावना है। यदि मौजूदा रफ्तार से गिरावट जारी रही तो गर्मी के महीनों में हैंडपंप और ट्यूबवेल भी जवाब दे सकते हैं।
कृषि और पशुपालन पर पड़ सकता है असर
गंगा की धारा के सिमटने और भूजल स्तर के गिरने का असर केवल पेयजल तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा प्रभाव कृषि और पशुपालन पर भी पड़ सकता है। रबी फसलों की सिंचाई पहले ही चुनौती बन सकती है और यदि समय पर पर्याप्त वर्षा नहीं हुई तो खरीफ सीजन की तैयारी भी प्रभावित होगी। किसानों का कहना है कि सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। ऐसे में यदि भूजल स्तर और नीचे गया तो लागत बढ़ेगी और उत्पादन पर असर पड़ेगा।
मौसम पैटर्न में बदलाव की आशंका
जल विशेषज्ञों का मानना है कि शहरीकरण, अत्यधिक भूजल दोहन और वर्षा की अनिश्चितता के कारण यह स्थिति उत्पन्न हो रही है। पिछले कुछ वर्षों से मौसम का पैटर्न भी बदलता नजर आ रहा है। कभी अचानक भारी बारिश तो कभी लंबा शुष्क दौर, इन उतार-चढ़ावों ने जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों ने जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और वैकल्पिक जल स्रोतों के विकास पर जोर दिया है। उनका कहना है कि केवल आपातकालीन उपायों से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि दीर्घकालिक योजना बनानी होगी।
प्रशासन सतर्क, नजरें आसमान पर
फिलहाल विभागीय स्तर पर निगरानी तेज कर दी गई है। जलापूर्ति व्यवस्था को बनाए रखने के लिए तकनीकी तैयारी की जा रही है। साथ ही भूजल स्तर और तापमान पर नियमित नजर रखी जा रही है। फागुन में ही गंगा के जलस्तर में आई कमी ने यह साफ संकेत दे दिया है कि इस वर्ष गर्मी सामान्य से अधिक तीव्र हो सकती है। अब सबकी नजरें आने वाले महीनों के मौसम और मानसून की चाल पर टिकी हैं। यदि समय रहते पर्याप्त वर्षा नहीं हुई, तो बिहार को भीषण गर्मी के साथ-साथ जल संकट का भी सामना करना पड़ सकता है।


