February 11, 2026

जनसुराज की याचिका पर बोले चीफ जस्टिस, कहा- जब जनता ने रिजेक्ट कर दिया, तो आप राहत पाने अदालत आ गए

नई दिल्ली/पटना। बिहार विधानसभा चुनाव को रद्द कराने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद सियासी हलकों में हलचल तेज हो गई है। प्रशांत किशोर की अगुवाई वाली जनसुराज पार्टी की याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा कि जब जनता ने किसी दल को नकार दिया है, तो राहत पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना उचित नहीं है। अदालत की इस टिप्पणी को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सम्मान से जोड़कर देखा जा रहा है।
याचिका और उसकी पृष्ठभूमि
दरअसल, जनसुराज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों को अवैध घोषित करने और दोबारा चुनाव कराने की मांग की थी। पार्टी का तर्क था कि चुनाव से पहले विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त योजनाओं और लोकलुभावन घोषणाओं का सहारा लिया गया, जिससे मतदाताओं पर असर पड़ा और चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हुई। याचिका में कहा गया था कि इस तरह की घोषणाएं लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ हैं और इसी वजह से चुनाव परिणामों को रद्द किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का माहौल
शुक्रवार को हुई प्रारंभिक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता पक्ष की दलीलों को सुना। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बेहद स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता का फैसला सर्वोपरि होता है और अदालतें केवल इस आधार पर चुनावी नतीजों को पलट नहीं सकतीं कि किसी राजनीतिक दल को अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
जनता के फैसले पर अदालत की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर जनता ने किसी दल को स्वीकार नहीं किया है, तो अदालत से राहत मांगना सही परंपरा नहीं कही जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव हारने या अपेक्षित समर्थन न मिलने के बाद न्यायपालिका के जरिए परिणाम बदलने की कोशिश लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। अदालत की इस टिप्पणी को एक सख्त संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
कानूनी रास्तों पर अदालत की नसीहत
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी संकेत दिया कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी शिकायतों के लिए कानून में पहले से ही स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं। अगर किसी को चुनाव में अनियमितता, आचार संहिता के उल्लंघन या किसी तरह की गड़बड़ी की शिकायत है, तो उसके लिए निर्वाचन आयोग और अन्य कानूनी मंच उपलब्ध हैं। सीधे पूरे चुनाव को रद्द कराने की मांग करना एक गंभीर विषय है, जिसके लिए ठोस सबूत और मजबूत कानूनी आधार जरूरी होता है।
मुफ्त योजनाओं के मुद्दे पर अदालत का रुख
जनसुराज पार्टी की ओर से यह दलील दी गई कि चुनाव से ठीक पहले घोषित की गई मुफ्त योजनाओं और लोकलुभावन वादों ने मतदाताओं को प्रभावित किया। इस पर अदालत ने संकेत दिया कि यह कोई नया मुद्दा नहीं है। चुनावी राजनीति में इस तरह के वादे लंबे समय से होते रहे हैं और केवल इसी आधार पर किसी पूरे चुनाव को अवैध ठहराना आसान नहीं है। अदालत ने इशारों में कहा कि इस विषय पर पहले भी बहस हो चुकी है।
प्रशांत किशोर और जनसुराज की राजनीति
गौरतलब है कि प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति में बदलाव के उद्देश्य से जनसुराज अभियान की शुरुआत की थी। बाद में इस अभियान को एक राजनीतिक दल का रूप दिया गया और विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई गई। हालांकि पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई। इसके बाद चुनाव नतीजों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया गया, जो अब अदालत की सख्त टिप्पणी के बाद चर्चा के केंद्र में आ गया है।
सियासी प्रतिक्रियाएं तेज
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद राजनीतिक गलियारों में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है। सत्तारूढ़ दलों ने अदालत की टिप्पणी को लोकतंत्र की मजबूती से जोड़ते हुए कहा कि जनता के फैसले का सम्मान होना चाहिए। वहीं विपक्षी खेमे में भी इस मुद्दे पर चर्चा तेज है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टिप्पणी भविष्य में इस तरह की याचिकाओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है।
आगे की राह और नजरें अदालत पर
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में विस्तृत आदेश सुरक्षित रखते हुए यह संकेत दिया है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में न्यायपालिका की भूमिका सीमित है और जनता के फैसले को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अदालत आगे इस याचिका पर क्या अंतिम रुख अपनाती है। हालांकि शुक्रवार की सुनवाई के दौरान की गई सख्त टिप्पणी से यह साफ हो गया है कि केवल राजनीतिक असफलता के आधार पर चुनावी नतीजों को चुनौती देना आसान नहीं होगा।

 

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