मणिपुर में फिर सरकार बनाने की तैयारी में भाजपा, दिल्ली बुलाए गए विधायक, तरुण चुग बने पर्यवेक्षक
इम्फाल। मणिपुर की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत दे रही है। लंबे समय से राष्ट्रपति शासन के अधीन चल रहे राज्य में भारतीय जनता पार्टी दोबारा सरकार गठन की दिशा में कदम बढ़ाती दिख रही है। दिल्ली से लेकर इंफाल तक तेज हुई राजनीतिक गतिविधियों ने यह साफ कर दिया है कि भाजपा अब राज्य में सत्ता की वापसी को लेकर गंभीर रणनीति पर काम कर रही है।
दिल्ली में बढ़ी राजनीतिक हलचल
पिछले कुछ दिनों में मणिपुर के 20 से अधिक भाजपा विधायक दिल्ली पहुंचे हैं। इन दौरों को सामान्य राजनीतिक मुलाकात मानने के बजाय सरकार गठन की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व विधायकों की राय जानना चाहता है और इस बात का आकलन किया जा रहा है कि मौजूदा परिस्थितियों में सरकार बनाना कितना व्यावहारिक है। इसी क्रम में भाजपा ने मणिपुर में विधायक दल के नेता के चुनाव के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त कर दिया है।
तरुण चुग को मिली बड़ी जिम्मेदारी
सोमवार को भाजपा ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुग को मणिपुर के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किया। उनका काम एनडीए विधायकों के साथ बैठक कर नेतृत्व को लेकर सहमति बनवाना होगा। पार्टी के अंदरखाने से संकेत मिल रहे हैं कि बहुत जल्द मणिपुर में एनडीए विधायकों की बैठक हो सकती है, जिसमें विधायक दल के नेता का चयन किया जाएगा।
राष्ट्रपति शासन खत्म होने से पहले कोशिश
मणिपुर में पहली बार 13 फरवरी 2025 को राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था। यह व्यवस्था छह महीने के लिए थी, जिसे अगस्त 2025 में एक बार फिर छह महीने के लिए बढ़ा दिया गया। अगले साल राष्ट्रपति शासन की अवधि पूरी होने वाली है। इससे पहले भाजपा के नेता चाहते हैं कि लोकतांत्रिक तरीके से सरकार का गठन कर लिया जाए, ताकि राज्य में राजनीतिक स्थिरता का संदेश दिया जा सके।
सामाजिक संतुलन साधने की रणनीति
भाजपा सूत्रों के अनुसार, नई सरकार के गठन में सामाजिक संतुलन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। चर्चा है कि मुख्यमंत्री मैतेई समुदाय से हो सकता है, जबकि उपमुख्यमंत्री पद कुकी समुदाय के किसी नेता को दिया जा सकता है। इसका मकसद यह संदेश देना है कि सरकार सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच तनाव और हिंसा की घटनाएं सामने आई थीं, जिसने राज्य की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित किया।
मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरे
अगर मुख्यमंत्री पद की बात करें तो कई नामों पर चर्चा चल रही है। पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की सरकार में विधानसभा स्पीकर रहे सत्यब्रत सिंह, पूर्व मंत्री टीएच बिस्वजीत सिंह और के. गोविंद दास के नाम सामने आ रहे हैं। ये तीनों नेता मैतेई समुदाय से आते हैं और संगठन के भीतर इनकी पकड़ मानी जाती है। हालांकि अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व को ही लेना है।
कुकी विधायकों की चिंता
भाजपा के भीतर कुकी समुदाय से आने वाले विधायकों की नाराजगी भी एक अहम मुद्दा बनी हुई है। उनका कहना है कि उनके समुदाय पर भारी दबाव है और यदि सरकार में उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो सत्ता का हिस्सा बनना मुश्किल होगा। कुकी विधायकों ने यह बात सीधे केंद्रीय नेतृत्व के सामने रखी है। इसी वजह से डिप्टी सीएम पद को लेकर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
केंद्र शासित प्रदेश की मांग भी चर्चा में
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी चल रही है कि कुछ विधायक मणिपुर को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने की मांग कर रहे हैं, हालांकि विधानसभा के साथ। उनका तर्क है कि मौजूदा हालात में इससे प्रशासनिक नियंत्रण बेहतर हो सकता है। हालांकि इस मांग को लेकर अभी कोई आधिकारिक रुख सामने नहीं आया है।
विधानसभा का कार्यकाल और राजनीतिक गणित
मणिपुर विधानसभा का कार्यकाल 2027 तक है। ऐसे में विधायकों की यह सोच है कि अगर अब सरकार बनती है तो कम से कम एक साल तक काम करने का मौका मिलेगा। इसके बाद विकास कार्यों और शांति बहाली के कुछ ठोस कदमों के साथ जनता के बीच चुनाव में जाया जा सकता है। 60 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के पास फिलहाल 37 विधायक हैं, जो बहुमत के लिहाज से मजबूत स्थिति मानी जाती है।
आगे क्या होगा
भाजपा की यह कवायद मणिपुर की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत कर सकती है। हालांकि यह सब इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी सामाजिक संतुलन, आंतरिक मतभेद और सुरक्षा हालात को किस तरह संभालती है। आने वाले दिनों में एनडीए विधायकों की बैठक और नेतृत्व का फैसला यह साफ कर देगा कि क्या मणिपुर में एक बार फिर भाजपा की सरकार बन पाएगी या नहीं।


