यूनेस्को विश्व धरोहर में लिस्ट में नामांकित होगा मेघालय का जीवित जड़ पुल, भारत को मिली बड़ी उपलब्धि
शिलांग। मेघालय के जीवित जड़ पुलों को लेकर भारत ने वैश्विक स्तर पर एक अहम कदम बढ़ाया है। इन अनोखे पुलों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की दिशा में आधिकारिक प्रक्रिया तेज हो गई है। भारत सरकार की ओर से 2026–27 की विश्व धरोहर सूची के लिए नामांकन डोजियर यूनेस्को को सौंप दिया गया है, जिसे देश के लिए एक बड़ी सांस्कृतिक और पर्यावरणीय उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
यूनेस्को को सौंपा गया नामांकन डोजियर
मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड के. संगमा ने गुरुवार को जानकारी दी कि पेरिस स्थित यूनेस्को मुख्यालय में भारत की ओर से जीवित जड़ पुलों का नामांकन डोजियर आधिकारिक रूप से जमा कर दिया गया है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से बताया कि यूनेस्को में भारत के राजदूत और स्थायी प्रतिनिधि विशाल वी. शर्मा ने यह डोजियर वर्ल्ड हेरिटेज सेंटर के निदेशक लाजारे असोमो एलौंदू को सौंपा। मुख्यमंत्री ने उम्मीद जताई कि इस वर्ष या अगले सत्र में मेघालय के जीवित जड़ पुलों को विश्व धरोहर का दर्जा मिल सकता है।
मुख्यमंत्री ने जताई उम्मीद
मुख्यमंत्री संगमा ने कहा कि यदि जीवित जड़ पुलों को यूनेस्को की सूची में स्थान मिलता है, तो इससे न केवल मेघालय बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक पहचान को मजबूती मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस पहल से इन पुलों के असली संरक्षक, यानी स्थानीय आदिवासी समुदायों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी। संगमा के अनुसार, यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों को अपनी विरासत के संरक्षण के लिए प्रेरित करेगी।
भारत सरकार और संस्थाओं की भूमिका
डोजियर सौंपे जाने के दौरान भारत के राजदूत विशाल वी. शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और मेघालय सरकार को इस नामांकन प्रक्रिया में सहयोग के लिए धन्यवाद दिया। यूनेस्को में भारत के स्थायी प्रतिनिधिमंडल की ओर से जारी बयान में कहा गया कि इस प्रयास में मेघालय के प्रधान सचिव फ्रेडरिक खारकोंगोर, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, विदेश मंत्रालय के अधिकारी, विषय विशेषज्ञ और स्थानीय समुदायों की अहम भूमिका रही है। यह सामूहिक प्रयास इस बात का संकेत है कि भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने के लिए गंभीर है।
क्या हैं जीवित जड़ पुल
मेघालय के खासी और जैंतिया पहाड़ियों की दक्षिणी ढलानों में पाए जाने वाले जीवित जड़ पुल दुनिया भर में अपनी तरह के अनोखे उदाहरण हैं। ये पुल किसी आधुनिक तकनीक या कंक्रीट से नहीं, बल्कि पेड़ों की जीवित जड़ों से बनाए जाते हैं। स्थानीय खासी और जैंतिया जनजातियां पीढ़ियों से रबर के पेड़ों की जड़ों को धीरे-धीरे नदियों और नालों के ऊपर बढ़ने के लिए प्रशिक्षित करती रही हैं। कई वर्षों की मेहनत के बाद ये जड़ें मजबूत पुल का रूप ले लेती हैं, जिन पर लोग आसानी से आ-जा सकते हैं।
प्रकृति और इंसान का अनूठा संबंध
यूनेस्को को सौंपे गए बयान में कहा गया है कि जीवित जड़ पुल केवल संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि एक जीवित सांस्कृतिक परिदृश्य का हिस्सा हैं। यह परिदृश्य लोगों, प्रकृति और आध्यात्मिकता के बीच गहरे और संतुलित संबंध को दर्शाता है। इन पुलों का निर्माण और रखरखाव स्थानीय समुदायों की पारंपरिक भूमि उपयोग, शासन व्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण प्रणालियों से जुड़ा हुआ है। यह दिखाता है कि कैसे मानव और प्रकृति मिलकर टिकाऊ समाधान विकसित कर सकते हैं।
मेई रामेव की अवधारणा
इस सांस्कृतिक परिदृश्य की जड़ें खासी और जैंतिया समाज की स्वदेशी अवधारणा मेई रामेव, यानी मदर अर्थ, में निहित हैं। इस विचारधारा के अनुसार धरती केवल संसाधन नहीं, बल्कि एक जीवित इकाई है, जिसके प्रति सम्मान, जिम्मेदारी और पारस्परिकता जरूरी है। जीवित जड़ पुल इसी सोच का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जहां विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चलते हैं।
स्वदेशी ज्ञान के संरक्षण की पहल
यूनेस्को नामांकन को भारत की उस प्रतिबद्धता के रूप में भी देखा जा रहा है, जिसमें वह जीवित सांस्कृतिक परंपराओं और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण पर जोर देता है। आज के समय में जब आधुनिक निर्माण तकनीकें तेजी से फैल रही हैं, ऐसे में जीवित जड़ पुल यह याद दिलाते हैं कि पारंपरिक ज्ञान भी टिकाऊ और प्रभावी हो सकता है। यह नामांकन स्थानीय समुदायों के ज्ञान और कौशल को वैश्विक पहचान दिलाने का माध्यम बन सकता है।
पर्यटन और स्थानीय विकास की संभावनाएं
यदि जीवित जड़ पुलों को विश्व धरोहर का दर्जा मिलता है, तो इससे मेघालय में पर्यटन को भी नई दिशा मिल सकती है। अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की रुचि बढ़ने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ होने की उम्मीद है। साथ ही, इससे पुलों और आसपास के प्राकृतिक वातावरण के संरक्षण के लिए अतिरिक्त संसाधन और ध्यान मिल सकेगा।
भारत के लिए गौरव का क्षण
मेघालय के जीवित जड़ पुलों का यूनेस्को विश्व धरोहर सूची के लिए नामांकन भारत के लिए गौरव का विषय है। यह पहल न केवल देश की सांस्कृतिक विविधता को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि भारत अपनी पारंपरिक विरासत और स्वदेशी ज्ञान को वैश्विक मंच पर सम्मान दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है। अब सभी की निगाहें यूनेस्को के फैसले पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में इस अनोखी जीवित विरासत को दुनिया के सामने और मजबूती से पेश कर सकता है।


