दिल्ली में यूजीसी कार्यालय के बाहर छात्रों का प्रदर्शन, नई गाइडलाइन वापस लेने की मांग, देशभर में विरोध जारी
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मुख्यालय के बाहर मंगलवार सुबह से ही छात्रों का जोरदार प्रदर्शन देखने को मिला। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए छात्र यूजीसी द्वारा हाल ही में लागू किए गए ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ के खिलाफ एकजुट होकर सड़कों पर उतर आए। हाथों में तख्तियां, बैनर और पोस्टर लिए छात्र लगातार नारेबाजी करते नजर आए। प्रदर्शन के चलते इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई और पुलिस का भारी बल तैनात किया गया।
नए नियम को लेकर छात्रों में नाराजगी
प्रदर्शन कर रहे छात्रों का कहना है कि यह नया नियम भले ही समानता और भेदभाव खत्म करने के उद्देश्य से लाया गया हो, लेकिन इसके कुछ प्रावधानों से उच्च शिक्षा संस्थानों में नई तरह की असमानता पैदा हो सकती है। खासतौर पर सामान्य वर्ग के छात्रों और कुछ शिक्षक संगठनों ने इसे लेकर चिंता जताई है। उनका आरोप है कि नियमों का स्वरूप एकतरफा है और इसमें सभी पक्षों के हितों का संतुलन नहीं दिखता। छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय परिसरों में पहले से ही कई शिकायत निवारण तंत्र मौजूद हैं। ऐसे में एक और व्यवस्था लाने से भ्रम और टकराव की स्थिति बन सकती है। प्रदर्शनकारियों के मुताबिक, नए नियमों में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से बचाव के लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रावधान नहीं हैं, जिससे निर्दोष छात्र या शिक्षक मानसिक उत्पीड़न का शिकार हो सकते हैं।
क्या है यूजीसी की नई गाइडलाइन
यूजीसी ने 15 जनवरी 2026 से ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम’ लागू किए हैं। आयोग का दावा है कि इन नियमों का मकसद विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत, सामाजिक और अन्य प्रकार के भेदभाव को रोकना है। इसके तहत हर उच्च शिक्षण संस्थान में एक विशेष शिकायत निवारण समिति बनाने का प्रावधान है, जो भेदभाव से जुड़े मामलों की सुनवाई करेगी। इसके अलावा, वंचित और हाशिए पर मौजूद वर्गों के छात्रों को अकादमिक और मानसिक सहयोग देने, जागरूकता कार्यक्रम चलाने और दोषी पाए जाने पर सख्त कार्रवाई की व्यवस्था भी इन नियमों में शामिल है। यूजीसी का कहना है कि ये कदम शिक्षा को अधिक समावेशी और सुरक्षित बनाने की दिशा में जरूरी हैं।
‘उल्टा भेदभाव’ का आरोप
प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने यूजीसी पर ‘उल्टा भेदभाव’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि समानता के नाम पर कुछ वर्गों को विशेष संरक्षण देने से दूसरे वर्गों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। छात्रों का तर्क है कि शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता और न्याय सभी के लिए समान रूप से लागू होना चाहिए। प्रदर्शन स्थल पर मौजूद कई छात्रों ने कहा कि वे भेदभाव के खिलाफ हैं, लेकिन किसी भी नियम को लागू करने से पहले उसके दुरुपयोग की संभावनाओं पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि अगर नियमों में संतुलन नहीं होगा तो इससे शिक्षा का माहौल प्रभावित हो सकता है।
नारेबाजी और माहौल
सुबह करीब 10 बजे शुरू हुए इस प्रदर्शन में सैकड़ों छात्र शामिल हुए। ‘नियम वापस लो’, ‘उच्च शिक्षा में समानता नहीं, विभाजन’ और ‘यूजीसी जवाब दो’ जैसे नारों से पूरा इलाका गूंज उठा। कुछ प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण तरीके से धरने पर बैठे रहे, जबकि कई छात्र अपने अनुभव साझा करते हुए मीडिया से बातचीत करते नजर आए। पुलिस प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए बैरिकेडिंग की और प्रदर्शनकारियों को यूजीसी भवन के मुख्य द्वार से कुछ दूरी पर रोक दिया। अब तक किसी तरह की हिंसा या झड़प की खबर नहीं है, लेकिन प्रशासन पूरी तरह सतर्क है।
देशभर में विरोध की आहट
दिल्ली के इस प्रदर्शन के साथ ही देश के अन्य हिस्सों से भी विरोध की खबरें सामने आ रही हैं। कई विश्वविद्यालय परिसरों में छात्र संगठनों ने बैठकें कर यूजीसी के नए नियमों पर आपत्ति जताई है। कुछ जगहों पर ज्ञापन सौंपने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है। छात्र संगठनों का कहना है कि अगर यूजीसी ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। उनका उद्देश्य नियमों को पूरी तरह रद्द कराना या उसमें व्यापक संशोधन कराना है।
आगे की राह
फिलहाल यूजीसी की ओर से इस प्रदर्शन पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि, आयोग पहले भी यह स्पष्ट कर चुका है कि नए नियम छात्रों के हित में हैं और उनका उद्देश्य किसी वर्ग को नुकसान पहुंचाना नहीं है। अब देखना यह होगा कि बढ़ते विरोध के बीच यूजीसी अपने रुख पर कायम रहता है या छात्रों की चिंताओं को देखते हुए नियमों पर पुनर्विचार करता है। इतना तय है कि समानता और न्याय जैसे संवेदनशील मुद्दों पर शुरू हुई यह बहस आने वाले दिनों में और गहराने वाली है।


