January 24, 2026

भाई वीरेंद्र ने राजद के खिलाफ खोला मोर्चा, पार्टी की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल, टिकट वितरण में गड़बड़ी की बात

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद राष्ट्रीय जनता दल के भीतर मंथन का दौर चल रहा है। हालांकि यह मंथन अब बंद कमरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खुलकर सार्वजनिक मंच पर दिखाई देने लगा है। पार्टी के वरिष्ठ विधायक भाई वीरेंद्र के ताजा बयान ने यह साफ कर दिया है कि राजद के अंदर सब कुछ सामान्य नहीं है। उन्होंने न केवल चुनावी हार की वजहों पर सवाल उठाए हैं, बल्कि टिकट वितरण और पार्टी की कार्यप्रणाली को लेकर नेतृत्व पर भी अप्रत्यक्ष हमला किया है।
चुनावी हार के बाद बढ़ती बेचैनी
राजद ने विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद आधिकारिक तौर पर हार का ठीकरा ईवीएम और वोट चोरी जैसे मुद्दों पर फोड़ा था। पार्टी नेतृत्व का कहना रहा कि जनमत उनके पक्ष में था, लेकिन परिणाम विपरीत आए। इसके उलट, भाई वीरेंद्र के बयान यह संकेत देते हैं कि पार्टी के भीतर कई नेता हार की असली वजह संगठनात्मक फैसलों और टिकट वितरण की रणनीति को मानते हैं। उनका यह बयान ऐसे समय पर आया है, जब पार्टी भविष्य की रणनीति पर विचार कर रही है।
दिनारा सीट का उदाहरण
भाई वीरेंद्र ने सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में दिनारा विधानसभा सीट का उदाहरण देते हुए अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि एक समय वे स्वयं और विजय मंडल एक साथ विधायक रह चुके हैं। उनके मुताबिक, जब पार्टी को अंततः यादव समाज के उम्मीदवार को ही टिकट देना था, तो फिर सिटिंग विधायक विजय मंडल का टिकट क्यों काटा गया। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि विजय मंडल में ऐसी कौन-सी कमी थी, जिसके कारण उन्हें दोबारा मौका नहीं दिया गया।
सिटिंग विधायक का टिकट कटने पर सवाल
भाई वीरेंद्र का कहना है कि विजय मंडल एक सिटिंग विधायक थे और क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ थी। उन्होंने यह भी बताया कि पार्टी के भीतर उन्होंने विजय मंडल का टिकट बचाने के लिए पूरी कोशिश की, लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई। इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व ने उनका टिकट काटकर किसी दूसरे उम्मीदवार को मैदान में उतार दिया। नतीजा यह हुआ कि राजद को दिनारा सीट पर हार का सामना करना पड़ा। उनके अनुसार यह हार गलत निर्णयों का सीधा परिणाम है।
बाहरी उम्मीदवारों को लेकर नाराजगी
अपने बयान में भाई वीरेंद्र ने सिर्फ एक सीट तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने आरोप लगाया कि कई जगहों पर ऐसे लोगों को टिकट दे दिए गए, जो उस जिले या क्षेत्र से जुड़े नहीं थे। उनका कहना था कि पार्टी में कुछ नेता ऐसे हैं, जो नाम के समाजवादी हैं, लेकिन तीन-तीन जिलों में अपना प्रभाव बनाए हुए हैं। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि कुछ लोग कैमूर, रोहतास और आरा तक में टिकट वितरण को प्रभावित करते हैं।
चुनिंदा लोगों के फैसलों पर सवाल
भाई वीरेंद्र ने तल्ख लहजे में कहा कि अगर किसी पार्टी में टिकट कुछ चुनिंदा लोगों की मर्जी से बांटे जाएंगे, तो परिणाम वही होंगे, जो इस बार राजद को देखने पड़े हैं। उनके इस बयान को पार्टी नेतृत्व और चुनावी रणनीति पर सीधा हमला माना जा रहा है। यह बयान यह भी दर्शाता है कि पार्टी के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर गहरी नाराजगी है।
दिनारा सीट का राजनीतिक संदर्भ
दिनारा विधानसभा सीट राजद के लिए पहले एक मजबूत गढ़ मानी जाती रही है। वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में विजय मंडल ने राजद के टिकट पर पहली बार जीत दर्ज की थी। उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी के प्रत्याशी को आठ हजार से अधिक मतों के अंतर से हराया था। इस जीत के बाद विजय मंडल को क्षेत्र में एक प्रभावशाली नेता के रूप में देखा जाने लगा था। इसके बावजूद 2025 के चुनाव में पार्टी ने उनका टिकट काटकर शशि शंकर कुमार उर्फ राजेश यादव को उम्मीदवार बनाया। चुनाव परिणाम सामने आने के बाद यह फैसला पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।
हार की असली वजह पर बहस
भाई वीरेंद्र के बयान के बाद यह बहस तेज हो गई है कि राजद की हार की असली वजह क्या रही। जहां नेतृत्व बाहरी कारणों की बात कर रहा है, वहीं पार्टी के भीतर से उठ रही आवाजें गलत टिकट वितरण और संगठनात्मक कमजोरियों की ओर इशारा कर रही हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह असंतोष केवल एक विधायक की नाराजगी नहीं है, बल्कि यह व्यापक असंतोष का संकेत हो सकता है।
नेतृत्व के सामने नई चुनौती
राजद के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है। एक ओर पार्टी को भविष्य की राजनीति और संगठन को मजबूत करने पर ध्यान देना है, वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी को भी संभालना है। भाई वीरेंद्र जैसे नेताओं के बयान यह दिखाते हैं कि पार्टी के भीतर आत्ममंथन की जरूरत है। यदि नेतृत्व ने इन सवालों को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाले समय में यह असंतोष और गहरा सकता है।
आने वाले दिनों पर टिकी निगाहें
फिलहाल, भाई वीरेंद्र के बयान ने राजद की अंदरूनी राजनीति को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। अब देखना यह होगा कि पार्टी नेतृत्व इस असंतोष को किस तरह संबोधित करता है। क्या टिकट वितरण को लेकर उठे सवालों पर खुला आत्ममंथन होगा या फिर इन आवाजों को नजरअंदाज कर दिया जाएगा। आने वाले दिनों में राजद की दिशा और दशा तय करने में यह मुद्दा अहम भूमिका निभा सकता है।

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