January 23, 2026

मुंबई में बिहार भवन को लेकर अशोक चौधरी की हुंकार, कहा- किसी का बाप वहां भवन बनने से नहीं रोक सकता, वे सब फालतू लोग

पटना। मुंबई में बिहार भवन के निर्माण को लेकर शुरू हुई सियासी बहस अब तेज बयानबाजी में बदलती नजर आ रही है। महाराष्ट्र की क्षेत्रीय पार्टियों महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) और शिवसेना की ओर से विरोध जताए जाने के बाद बिहार की सत्ताधारी गठबंधन के नेताओं ने कड़ा जवाब दिया है। इस पूरे विवाद के केंद्र में दक्षिण मुंबई के एल्फिंस्टन इस्टेट क्षेत्र में प्रस्तावित 30 मंजिला “बिहार भवन” है, जिसके लिए बिहार सरकार ने हाल ही में 314.20 करोड़ रुपये की प्रशासनिक मंजूरी दे दी है। बिहार सरकार का कहना है कि यह भवन सिर्फ सरकारी गतिविधियों के लिए नहीं, बल्कि मुंबई में इलाज कराने आने वाले बिहार के गंभीर मरीजों, उनके परिजनों और जरूरतमंद नागरिकों के लिए भी उपयोगी होगा। वहीं महाराष्ट्र की कुछ क्षेत्रीय पार्टियां इसे राज्य की जमीन और स्थानीय संसाधनों पर “बोझ” बताते हुए इसका विरोध कर रही हैं। इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी लगातार उग्र होती जा रही है। बिहार सरकार के मंत्री अशोक चौधरी ने मनसे और शिवसेना के विरोधी सुरों पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि “किसी के बाप में दम नहीं है जो बिहार भवन को बनने से रोक दे।” अशोक चौधरी ने यह भी कहा कि विरोध करने वाले खुद को वहां का राजा समझते हैं, जबकि देश में लोकतंत्र है, राजतंत्र नहीं। उन्होंने मनसे प्रमुख राज ठाकरे पर भी तीखा हमला बोलते हुए उन्हें “फालतू आदमी” बताया। चौधरी के इस बयान के बाद राजनीतिक तापमान और बढ़ गया है। विरोध की शुरुआत मनसे की तरफ से हुई। पार्टी नेता यशवंत किल्लेदार ने स्पष्ट कहा कि मुंबई में बिहार भवन नहीं बनने दिया जाएगा। वहीं उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने भी इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई। शिवसेना नेता विनायक राउत ने आरोप लगाया कि यह मुंबई की जमीन “हड़पने” जैसी कार्रवाई है और यदि इसे रोका नहीं गया तो भविष्य में बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स जैसे इलाके में “गुजरात भवन” जैसे अन्य राज्यों के भवन बनाने की मांग भी उठ सकती है। शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत ने भी कहा कि अब जो शिवसेना बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) में सत्ता में आएगी, उसकी जिम्मेदारी होगी कि वह इस प्रस्ताव पर अपना पक्ष रखे। उन्होंने यह भी कहा कि शिंदे गुट खुद को शिवसेना कहता है तो उन्हें भी इस पर बोलना चाहिए और जरूरत पड़े तो विरोध करना चाहिए। हालांकि शिंदे गुट के नेता संजय निरुपम ने मनसे के विरोध को गलत करार दिया है। उन्होंने कहा कि बिहार भवन का उद्देश्य राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय है। निरुपम के मुताबिक यह भवन खासकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए मुंबई आने वाले मरीजों और उनके रिश्तेदारों के ठहरने के लिए बनाया जा रहा है, जिससे उन्हें राहत मिलेगी। बिहार फाउंडेशन (मुंबई) के अध्यक्ष कैसर खालिद ने भी बिहार भवन को “रणनीतिक परियोजना” बताया। उनका कहना है कि यह भवन केवल रहने की सुविधा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके जरिए मुंबई से बिहार में उद्योग, व्यापार और निवेश बढ़ाने की दिशा में योजना भी बनाई जाएगी। वहीं भवन निर्माण विभाग के सचिव कुमार रवि ने बताया कि प्रस्तावित बिहार भवन पर्यावरण के अनुकूल होगा। बताया गया है कि यह भवन मुंबई पोर्ट ट्रस्ट की जमीन पर दक्षिण मुंबई के एल्फिंस्टन इस्टेट में बनेगा। प्रस्ताव के अनुसार यह इमारत बेसमेंट सहित 30 मंजिला होगी, जिसकी ऊंचाई लगभग 69 मीटर होगी। इसमें कुल 178 कमरे होंगे, जिनका उपयोग सरकारी अधिकारियों, अतिथियों और जरूरतमंद नागरिकों के लिए किया जाएगा। साथ ही 240 बेड की क्षमता वाला एक विशेष छात्रावास भी प्रस्तावित है, जहां इलाज कराने आए मरीजों और उनके परिजन ठहर सकेंगे। गौरतलब है कि नवी मुंबई में पहले से उत्तर प्रदेश भवन, मध्यप्रदेश भवन, राजस्थान भवन, कर्नाटक भवन, असम भवन, मेघालय भवन, केरल भवन, उत्तराखंड सहित कई राज्यों के भवन मौजूद हैं, जहां संबंधित राज्यों से आने वाले लोगों को रहने की सुविधाएं मिलती हैं। बिहार सरकार का तर्क है कि इसी तर्ज पर बिहार भवन की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। फिलहाल, मनसे और शिवसेना के विरोध तथा बिहार सरकार की आक्रामक प्रतिक्रिया के चलते यह मुद्दा महाराष्ट्र-बिहार राजनीति में नया विवाद बनकर उभरा है।

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