January 23, 2026

7 वर्षीय मासूम के साथ दरिंदगी करने वाले आरोपी को होगी फांसी, गुजरात कोर्ट ने दिया फैसला

पटना। गुजरात के राजकोट में एक विशेष अदालत ने सात वर्षीय एक बच्ची के साथ बेहद क्रूर बलात्कार के मामले में आरोपी को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। यह मामला वर्ष 2025 के दिसंबर महीने की उस दर्दनाक घटना से जुड़ा है, जिसने पूरे समाज को हिलाकर रख दिया था। अदालत के इस निर्णय ने एक लंबी कानूनी प्रक्रिया का समापन किया है, जो अपराध की गंभीरता और न्यायिक तंत्र की गति दोनों को रेखांकित करता है। यह सारी घटना 4 दिसंबर 2025 की दोपहर को राजकोट जिले के कानपार गांव में घटी। सात साल की मासूम बच्ची अपने भाई-बहनों के साथ खेल रही थी। इसी दौरान आरोपी रामसिंह तेरसिंह दुडवा, जो कि एक तीस वर्षीय युवक है, मोटरसाइकिल पर वहां पहुंचा। उसने बच्ची को उठाया और एक पेड़ के पास ले गया। वहां उसने न सिर्फ बच्ची के साथ बलात्कार किया, बल्कि उसके बाद एक पांच इंच लंबी लोहे की रॉड उसके शरीर में घुसा दी। इस अमानवीय यातना के दौरान बच्ची की चीखें सुनकर उसकी चाची मौके पर दौड़ी आईं, लेकिन तब तक आरोपी वहां से भाग चुका था। बच्ची की हालत गंभीर थी और खून बह रहा था। परिवार ने तुरंत उसे पहले गांव के अस्पताल और फिर बाद में राजकोट के जनाना अस्पताल ले जाया, जहां डॉक्टरों ने लंबे और जटिल ऑपरेशन के बाद उसकी जान बचाई। घटना की सूचना पुलिस को मिली, लेकिन शुरू में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। हालांकि, पुलिस ने संदेह के आधार पर 8 दिसंबर को ही आरोपी रामसिंह को गिरफ्तार कर लिया। जांच में पुलिस ने हिरासत में लिए गए आरोपी से पूछताछ की और घटनास्थल का मुआयना किया। जांच की दिशा तब और मजबूत हुई जब उसी पेड़ के नीचे से खून से सनी वह लोहे की छड़ बरामद हुई, जिसका जिक्र बच्ची ने किया था। फॉरेंसिक विशेषज्ञों को बुलाया गया और वहां से आरोपी के बाल भी मिले। फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला यानी एफएसएल की रिपोर्ट ने इस मामले में निर्णायक भूमिका निभाई। डीएनए परीक्षण से पुष्टि हुई कि मौके से बरामद बाल आरोपी रामसिंह के ही थे और छड़ पर लगा खून पीड़ित बच्ची का था। साथ ही, आरोपी के मोबाइल फोन के सीडीआर यानी कॉल डिटेल रिकॉर्ड से पता चला कि घटना के समय वह उसी इलाके में मौजूद था। इन ठोस सबूतों के आधार पर पुलिस ने गिरफ्तारी के मात्र चार दिन बाद, 8 दिसंबर को ही आरोपपत्र अदालत में दाखिल कर दिया। यह जांच की तेज गति उल्लेखनीय है। मामला तेजी से सुनवाई के लिए गया। 12 जनवरी 2026 को अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराया। सजा सुनाने की तारीख पहले 15 जनवरी थी, जिसे बाद में 17 जनवरी तक के लिए स्थगित कर दिया गया। अंततः शनिवार, 17 जनवरी को विशेष अदालत के न्यायाधीश वी. ए. राणा ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया। न्यायाधीश ने अपने फैसले में इस अपराध की अत्यधिक क्रूरता, निर्दोष बच्ची पर हुए जीवनभर के शारीरिक और मानसिक प्रभाव, तथा समाज में इस तरह के अपराधों के प्रति एक सख्त संदेश देने की आवश्यकता को रेखांकित किया। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए आरोपी रामसिंह तेरसिंह दुडवा को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। इस दौरान पीड़िता के पिता ने भी अदालत को एक विस्तृत पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई थी। यह मामला और अदालत का त्वरित फैसला कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पहला, यह बाल यौन शोषण के मामलों में फॉरेंसिक सबूतों और वैज्ञानिक जांच की अहमियत को दर्शाता है। दूसरा, यह दर्शाता है कि गंभीर और संगीन अपराधों में न्यायिक प्रक्रिया तेज गति से भी पूरी की जा सकती है। तीसरा, यह फैसला समाज के उस बड़े वर्ग की भावनाओं को एक जवाब है, जो ऐसे अमानवीय अपराधों के लिए कड़ा से कड़ा दंड मांगता है। न्यायालय ने ‘दुर्लभ से दुर्लभ मामला’ के सिद्धांत को अपनाते हुए यह सजा दी है, जिसका अर्थ है कि जब अपराध इतना भयानक और असामान्य हो कि समाज की नैतिक चेतना को झकझोर दे, तो उसमें मृत्युदंड ही उचित सजा हो सकती है। हालांकि, भारतीय न्याय प्रणाली में यह सजा अंतिम नहीं है। आरोपी उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है, और राष्ट्रपति से दया याचिका भी मांग सकता है। फिर भी, तलघट अदालत के इस स्पष्ट और सख्त फैसले ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि ऐसी बर्बरता की कोई भी माफी नहीं हो सकती। यह मामला हमें बाल सुरक्षा के प्रति और सजग होने, समाज में नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देने और ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए सामूहिक जिम्मेदारी का एहसास कराता है।

 

 

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