January 17, 2026

विकलांग बच्चों के पुनर्वास और शिक्षा में शिक्षकों व माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण

तीन दिवसीय राष्ट्रीय ‘सीआरई’ प्रशिक्षण कार्यशाला में विद्वानों ने दी राय, अभिभावक भी लें प्रशिक्षण
फुलवारी शरीफ। विकलांग जनों का पुनर्वास एक चुनौती भरा कार्य है, परिवार के लिए भी, समाज के लिए भी और सरकार के लिए भी। किंतु यदि ये तीनों मिलकर कार्य करें तो चुनौतियों से भरा यह कार्य आसान हो सकता है। एक विकलांग व्यक्ति सबसे पहले अपने परिवार में हीं उपेक्षा और दुराग्रह का शिकार होता है। समाज की उपेक्षाएं और अवहेलना उसे तोड़ देती हैं और उसका आत्मबल कमजोर हो जाता है। जो भीतर से टूट जाए, वह शीघ्रता से उबर नहीं पाता। इसलिए यह जरूरी है कि विकलांगजनों के प्रति परिवार और समाज का रूख सहानुभूतिपूर्ण और सहयोगात्मक हो, ताकि उनका मनोबल कभी न टूटे। विशेषकर विकलांग बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास में विशेष शिक्षकों के साथ माता-पिता की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है। इसलिए ऐसे अभिभावकों को भी प्रशिक्षण लेना चाहिए, जिनके बच्चे किसी भी प्रकार की विकलांगता के शिकार हैं। यह विचार यहां बेउर स्थित इंडियन इंस्टिच्यूट आॅफ हेल्थ एजुकेशन ऐंड रिसर्च में भारतीय पुनर्वास परिषद के सौजन्य से आयोजित तीन दिवसीय सीआरई प्रशिक्षण कार्यशाला के उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता करते हुए संस्थान के निदेशक प्रमुख डॉ. अनिल सुलभ ने व्यक्त किया। डॉ. सुलभ ने कहा कि विशेषज्ञ पुनर्वास कर्मी और चिकित्सक भी तभी सफल होंगे, जब उन्हें सबका सहयोग मिलेगा। इसलिए समाज को जागरूक करने का काम भी साथ-साथ बढ़ाना आवश्यक है।
‘विकलांग जनों की शिक्षा और पुनर्वास की हस्तक्षेप प्रक्रिया में माता-पिता की समान भूमिका’ विषय पर आयोजित इस कार्यशाला में सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ. नीरज कुमार वेदपुरिया, डॉ. अंजु कुमारी तथा प्रो. कपिल मुनि दूबे ने अपने वैज्ञानिक-पत्र प्रस्तुत किए। उद्घाटन-सत्र का संचालन डॉ. अवनीश रंजन ने किया। कार्यशाला में डॉ. नवनीत कुमार, अभिजीत पांडेय तथा संतोष कुमार सिंह समेत बिहार, झारखंड, दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान से 100 पुनर्वास-कर्मी एवं विशेष-शिक्षक भाग ले रहे हैं।

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