रामगढ़ उपचुनाव: जन सुराज पार्टी ने सुशील कुशवाहा को दिया टिकट, पीके ने की घोषणा
पटना। बिहार के चार विधानसभा सीटों पर होने जा रहे उपचुनावों में जन सुराज पार्टी ने कैमूर जिले की रामगढ़ सीट से सुशील कुशवाहा को उम्मीदवार घोषित किया है। यह घोषणा पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर (पीके) द्वारा की गई। सुशील कुशवाहा पहले बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के प्रदेश महासचिव रह चुके हैं और उन्होंने 2019 में बक्सर लोकसभा सीट से चुनाव भी लड़ा था, जिसमें उन्हें 80,000 वोट मिले थे और वह तीसरे स्थान पर रहे थे। उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से हुई थी, लेकिन अब वह जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार हैं।
सुशील कुशवाहा का राजनीतिक सफर
सुशील कुशवाहा की राजनीतिक यात्रा काफी लंबी और विविधतापूर्ण रही है। अपने करियर की शुरुआत में वह बीजेपी से जुड़े थे, लेकिन बाद में उन्होंने बसपा का दामन थामा और प्रदेश महासचिव के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा के टिकट पर उन्होंने बक्सर से चुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें 80,000 वोट मिले। हालाँकि वह तीसरे स्थान पर रहे, लेकिन उन्होंने अपने इलाके में एक मजबूत जमीनी पकड़ बनाई। अब जन सुराज पार्टी के टिकट पर रामगढ़ उपचुनाव में उतरने के साथ, कुशवाहा अपनी राजनीतिक पहचान को और मजबूत करने की कोशिश करेंगे।
प्रशांत किशोर की रणनीति और उम्मीदवार की घोषणा
जन सुराज पार्टी के कार्यवाहक अध्यक्ष मनोज भारती ने सुशील कुशवाहा की उम्मीदवारी की घोषणा की और उन्हें एक जमीनी कार्यकर्ता और अनुभवी नेता बताया। इससे पहले सोमवार को प्रशांत किशोर ने रामगढ़ सीट के लिए पांच संभावित उम्मीदवारों के नाम सुझाए थे, जिनमें विनायक प्रसाद जायसवाल, शमीम अहमद, आनंद सिंह, राम नारायण राम और सुशील कुशवाहा शामिल थे। आखिरकार, जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखते हुए सुशील कुशवाहा को टिकट दिया गया। कुशवाहा जाति से होने के नाते, उनका चयन क्षेत्र में मौजूद जातिगत ध्रुवीकरण को साधने की एक रणनीति मानी जा रही है।
रामगढ़ सीट पर जातिगत समीकरण और चुनावी मुकाबला
रामगढ़ विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव जातिगत समीकरणों के कारण बेहद रोचक हो गया है। आरजेडी ने इस सीट से जगदानंद सिंह के बेटे अजीत सिंह को मैदान में उतारा है, जो कि राजपूत समुदाय से आते हैं। वहीं, बीजेपी ने अशोक सिंह को उम्मीदवार बनाया है, जो राजपूत समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रकार, दोनों प्रमुख दलों ने राजपूत उम्मीदवारों पर दांव लगाया है। दूसरी ओर, बसपा ने यादव समुदाय पर दांव खेलते हुए सतीश यादव को अपना उम्मीदवार बनाया है। ऐसे में जन सुराज पार्टी ने कुशवाहा जाति से सुशील कुशवाहा को टिकट देकर एक नया समीकरण बनाने की कोशिश की है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कुशवाहा को मैदान में उतारने का फैसला जातिगत समीकरणों के हिसाब से एक अहम चाल है, क्योंकि यह समुदाय क्षेत्र में अच्छी खासी संख्या में है और इसका प्रभाव चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है।
सुशील कुशवाहा की लोकप्रियता और जमीनी पकड़
सुशील कुशवाहा की छवि एक जमीनी नेता की रही है। इलाके में उनके समर्थकों की अच्छी संख्या है और उनके समाज के लोगों के बीच उनकी पकड़ भी मजबूत मानी जाती है। उन्होंने 2019 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर बक्सर से लोकसभा का चुनाव लड़ा था, जिसमें उन्हें 80,000 वोट मिले थे। यह चुनावी अनुभव उन्हें रामगढ़ उपचुनाव में मददगार साबित हो सकता है।
उपचुनाव का रोचक मुकाबला
रामगढ़ सीट पर उपचुनाव का मुकाबला अब और भी दिलचस्प हो गया है। जहां आरजेडी और बीजेपी ने राजपूत उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, वहीं बसपा ने यादव जाति पर दांव खेला है। इसी बीच जन सुराज पार्टी ने कुशवाहा को मैदान में उतारकर चुनावी समीकरण को और पेचीदा बना दिया है। इस उपचुनाव में जातिगत समीकरणों और जनाधार के आधार पर कड़ा मुकाबला होने की संभावना है। सुशील कुशवाहा के नाम की घोषणा के साथ ही रामगढ़ का उपचुनाव बिहार की राजनीति में खासा अहम हो गया है।


