January 16, 2026

भारत पर लगेगा 500 फ़ीसदी टैरिफ, अमेरिका ने बिल को दी मंजूरी, संसद में वोटिंग से होगा फैसला

नई दिल्ली। अमेरिका ने रूस के खिलाफ अपने रुख को और कड़ा करते हुए एक अहम कदम उठाया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस पर सख्त प्रतिबंधों से जुड़े एक नए बिल को मंजूरी दे दी है। यह बिल न केवल रूस को सीधे तौर पर निशाना बनाता है, बल्कि उन देशों पर भी दबाव बनाने की कोशिश करता है, जो यूक्रेन युद्ध के बावजूद रूस से तेल और अन्य संसाधनों का व्यापार कर रहे हैं। इस फैसले का असर भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों पर भी पड़ सकता है।
सैंक्शनिंग ऑफ रशिया एक्ट 2025 की पृष्ठभूमि
इस विधेयक का नाम सैंक्शनिंग ऑफ रशिया एक्ट 2025 रखा गया है। यह बिल पिछले कई महीनों से तैयार किया जा रहा था और अब इसे अमेरिकी संसद में पेश करने की तैयारी है। रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के अनुसार, उन्होंने व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति ट्रम्प से इस विषय पर बातचीत की, जिसके बाद बिल को संसद में लाने की मंजूरी मिली। इसे अगले सप्ताह वोटिंग के लिए पेश किया जा सकता है।
इस कानून का मुख्य उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है, ताकि यूक्रेन युद्ध में उसकी सैन्य क्षमता कमजोर की जा सके।
रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर निशाना
इस बिल का सबसे अहम और विवादास्पद प्रावधान यह है कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाया जा सकता है। इसमें 500 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाने का प्रस्ताव शामिल है। अमेरिका का आरोप है कि रूस सस्ते तेल की बिक्री से जो राजस्व कमा रहा है, उसका इस्तेमाल युद्ध में किया जा रहा है। भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों ने पिछले कुछ वर्षों में रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई है। ऐसे में यह बिल इन देशों के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है।
रूस के अहम सेक्टरों पर प्रतिबंध
इस एक्ट के तहत रूस के ऊर्जा, बैंकिंग और रक्षा क्षेत्रों को सीधे तौर पर निशाना बनाया गया है। रूसी तेल और गैस कंपनियों, बड़े बैंकों और डिफेंस इंडस्ट्री पर कड़े प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही रूस से जुड़े वैश्विक नेटवर्क पर भी कार्रवाई की बात कही गई है। इसके अलावा, उन तीसरे देशों, कंपनियों या बैंकों पर भी सेकेंडरी सैंक्शन लगाए जाएंगे, जो रूस को प्रतिबंधों से बचने में मदद करते पाए जाएंगे। यानी यदि कोई देश या संस्था घुमावदार रास्तों से रूस के साथ कारोबार करती है, तो वह भी अमेरिकी कार्रवाई की जद में आ सकती है।
रूसी संपत्तियों का यूक्रेन पुनर्निर्माण में उपयोग
बिल में एक और महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों में फ्रीज की गई रूसी संपत्तियों को यूक्रेन के पुनर्निर्माण में इस्तेमाल करने की कानूनी व्यवस्था बनाई जाएगी। इससे युद्ध के कारण हुए नुकसान की भरपाई की जाएगी। यह कदम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद का कारण बन सकता है, लेकिन अमेरिका इसे रूस पर दबाव बनाने का एक प्रभावी तरीका मान रहा है।
कार्यकारी आदेश से कानून तक
इस एक्ट के जरिए रूस के खिलाफ जारी ट्रम्प के कार्यकारी आदेशों को कानून का रूप दिया जाएगा। इसका मतलब यह है कि भविष्य में कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति केवल अपने निर्णय से इन प्रतिबंधों को हटा या नरम नहीं कर सकेगा। यदि किसी तरह की छूट या राहत देनी होगी, तो उसके लिए कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होगी। इससे रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों को लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखने की रणनीति साफ दिखाई देती है।
द्विदलीय समर्थन और राजनीतिक मजबूती
यह बिल द्विदलीय है, यानी इसे रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों दलों का समर्थन प्राप्त है। इसे रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने मिलकर पेश किया है। लिंडसे ग्राहम के अनुसार, इस बिल के 85 सह-प्रायोजक हैं, जो सीनेट के 80 प्रतिशत से अधिक सदस्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे साफ है कि रूस के खिलाफ सख्त रुख पर अमेरिका की राजनीति में व्यापक सहमति है।
भारत के लिए बढ़ती चुनौतियां
यदि यह बिल पास हो जाता है, तो भारत के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अमेरिका पहले ही रूसी तेल की खरीद को लेकर भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगा चुका है। कुल मिलाकर भारत पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लागू हो चुका है, जिससे अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात प्रभावित हो रहा है। भारत और अमेरिका के बीच इस टैरिफ विवाद को सुलझाने के लिए व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही है। भारत चाहता है कि कुल टैरिफ को घटाकर 15 प्रतिशत किया जाए और रूसी तेल पर लगाया गया अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क पूरी तरह हटाया जाए।
भारत की कूटनीतिक कोशिशें
सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने बताया कि उन्होंने जनवरी की शुरुआत में भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा से मुलाकात की थी। इस मुलाकात में भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद कम करने पर चर्चा हुई। भारतीय पक्ष ने अमेरिका से अतिरिक्त टैरिफ हटाने का अनुरोध किया है। भारत ने संकेत भी दिए हैं कि वह रूस से तेल आयात धीरे-धीरे कम कर रहा है, ताकि अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ संबंध संतुलित रखे जा सकें।
रूसी तेल आयात में गिरावट
आंकड़ों से भी यह साफ होता है कि भारत ने रूस से तेल आयात घटाना शुरू कर दिया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर में भारत का रूसी तेल आयात करीब 17.7 लाख बैरल प्रतिदिन था, जो दिसंबर में घटकर लगभग 12 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। आने वाले महीनों में यह आंकड़ा 10 लाख बैरल प्रतिदिन से भी नीचे जा सकता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद रूस की बड़ी तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ा है, जिसका असर भारत के आयात पर भी दिखने लगा है।
भारत के लिए आगे की राह
यह बिल पास होता है या नहीं, यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि अमेरिका रूस के खिलाफ अपने प्रतिबंधों को और मजबूत करना चाहता है। इसका असर केवल रूस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और भारत जैसे देशों की रणनीति पर भी पड़ेगा। नए साल में भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता से कोई ठोस समाधान निकलता है या नहीं, इस पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

You may have missed