शिव धनुष और जगत जननी मां सीता के परिचय प्रसंग सुनकर मंत्रमुग्ध हुए श्रद्धालु
पालीगंज। खिरिमोड़ थाना क्षेत्र के रघुनाथपुर गांव में आयोजित लक्ष्मी नारायण महायज्ञ की शुरूआत के पूर्व गुरुवार को चल रहे बाल्मीकि रामायण कथा के दौरान शिव धनुष और जगत जननी मां सीता जी की परिचय प्रसंग श्री स्वामीजी महाराज के मुख से सुनकर श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ में उपस्थित हुए हजारों श्रद्धालु भाव विभोर और मंत्रमुग्ध हो गए। यह सुअवसर पटना जिले के पालीगंज अनुमंडल के रघुनाथपुर गांव में अनन्त श्री विभूषित वैकुंठवासी स्वामी श्री परांकुशाचार्य जी महाराज की 155वीं जयंती सह श्रीलक्ष्मी नारायण महायज्ञ के अवसर पर मिला। जिसमें हरिवंश पुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण एवं श्रीमद् बाल्मीकि रामायण की कथा चल रही है।


इस अवसर श्री स्वामी रंग रामानुजाचार्य जी महाराज के द्वारा श्री राम कथा का प्रवचन चल रहा है। कथा सुनने के लिए भक्तों की तांता लगी हुई है। साथ ही संगीत का कार्यक्रम चल रहा है। संगीत के कलाकार अच्युत प्रपन्न जी, जगन्नाथ जी, रंगनाथ जी, विकास जी एवं आचार्य सुनील जी के गीतों से पूरा वातावरण भक्तिमय बना हुआ है। प्रवचन प्रसंग में श्री स्वामी जी ने शिव धनुष एवं सीता का परिचय देते हुए कहा कि जनक ने विश्वामित्र से पूछा कि मैं आपकी क्या सेवा करूं? विश्वामित्र ने कहा कि ये राम-लक्ष्मण दोनों वीर राजा दशरथ के पुत्र हैं। आपके यहां शिव धनुष देखने के लिए आए हैं। आप इन्हें दिखा दीजिए। इससे इनकी इच्छा पूरी हो जाएगी। यह दोनों राजकुमार धनुष देखकर लौट जाएंगे। राजा जनक ने कहा कि मैं इस धनुष का परिचय देता हूं। विश्वकर्मा ने दो दिव्य धनुष का निर्माण कर एक धनुष त्रिपुर का वध करने के लिए शंकर जी को दिया तथा दूसरा धनुष भगवान विष्णु को दिया। त्रिपुर के वध के बाद शंकर जी ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ को ध्वस्त कर देवताओं से कहा कि दक्ष ने अपने यज्ञ में भाग नहीं दिया है। मैं यज्ञ में भाग लेना चाहता था, परंतु लोगों ने प्रयास नहीं किया। अत: आज मैं इस धनुष से आप देवों का मस्तक काट डालूंगा। देवगण भयभीत होकर शंकर जी की स्तुति करने लगे। देवों की स्तुति से प्रसन्न होकर शंकर जी ने धनुष को उनको दे दिया। जनक जी ने कहा कि देवों ने उस धनुष को मेरे पूर्वज निमि के जेष्ठ पुत्र देवरात के पास धरोहर के रूप में दे दिया था। वहीं यह शिव धनुष है, जिसकी पूजन मेरे यहां सदा होता रहा है।
महाराज ने सीता विवाह पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह धनुष सीता विवाह का निमित्त कैसे बना? यह कहते हुए राजा जनक ने सीता उत्पत्ति का प्रसंग बताया। उन्होंने कहा कि एक दिन यज्ञ के लिए भूमि शोधनार्थ खेत में हल चल रहा था। हल के अग्रभाग से जोती गई भूमि से एक कन्या प्रकट हो गई। हल के अग्रभाग के फार को सीता कहते हैं। उससे उत्पन्न होने के कारण उस कन्या का नाम सीता रखा गया। सीता शिव धनुष से बाल्य अवस्था से खेलती रही, वह उसे ऐसे उठाती मानों वह खिलौना हो। सीता के लिए धनुष उठाना एक मामूली दिनचर्या थी। जिसके लेकिन दूसरे के लिए यह धनुष किसी बड़े शील के बराबर था। जिसके कारण हमने यह प्रतिज्ञा की, जो धनुष को खेल-खेल में उठता हो और उसके तोड़ने वाले सुरवीर और योग्य वर से सीता का विवाह करूंगा। वह मेरी अयोनिजा कन्या जब विवाह के योग्य हो गई तब मैंने यह निश्चय किया कि जो अपने पराक्रम से इस धनुष की प्रत्यंचा को चढ़ा देगा, उसी के साथ मैं इसका विवाह करूंगा।

