एससी-एसटी तथा ओबीसी के आरक्षण की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाए भारत सरकार : इमारते शरीयत
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फुलवारी शरीफ। इमारत-ए-शरीयत के हजरत मौलाना मोहम्मद वली रहमानी ने रविवार को इमारत शरिया में आयोजित एक प्रेस कान्फ्रेंस में कहा कि एससी-एसटी तथा ओबीसी के लिए आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला उन वर्गों की स्थिति के विरुद्ध है, जिससे उन्हें सख्त नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के निर्माताओं ने सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक तथा सांस्कृतिक रूप से कमजोर, दबे कुचले और शताब्दियों से ताकतवारों के जुल्म के शिकार लोगों को न्याय देने तथा उन्हें समाज में बराबरी का अवसर देने के लिए संविधान में ऐसे लोगों के लिए शिक्षा, रोजगार तथा राजनीति में आरक्षण का प्रावधान रखा था। आरक्षण का प्रावधान उस सामाजिक और सांस्कृतिक असमानता की क्षतिपूर्ति के लिए है, जो भारत के शक्तिशाली वर्ग ने यहां के मूलनिवासियों एवं असहाय वर्गोंं के साथ शताब्दियों से अपना रखा था। आरक्षण ही वह रास्ता है, जिससे निर्बलों को बल, बेजबानों को जबान और दबे-कुचले लोगों को सर उठाने की शक्ति मिलती है। अगर यह रास्ता बंद कर दिया जाएगा तो भारतीय समाज एक बार फिर उसी असमानता, अन्याय एवं जुल्म की ओर चल पड़ेगा। इसलिए मेरा साफ कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन वर्गों के लिए बहुत ही हानिकारक है। एससी-एसटी, ओबीसी तथा अन्य असहाय वर्गों के अधिकार की आवाज को सबों को मिलकर बंद करनी चाहिए और देश में सीएए, एनआरसी एवं एनपीआर के विरुद्ध, जो प्रदर्शन हो रहे हैं उनमें आरक्षण के मुद्दे को भी जोड़ना आवश्यक है। ऐसा लगता है कि यह फैसला केन्द्र की भाजपा सरकार के दबाव में दिया गया है। क्योंकि भाजपा एवं आरएसएस हमेशा से आरक्षण विरोधी रही है। पहले भी आरएसएस के प्रवक्ता मदन मोहन वैद्य आरक्षण को अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा देने वाला बता चुके हैं। जिससे स्पष्ट है कि आरएसएस आरक्षण को समाप्त करना चाहता है। भारत सरकार का दायित्व है कि आरक्षण की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाए और उस के लिए संसद से मजबूत कानून पास करे ताकि आरक्षण सुरक्षित हो सके और उस पर किसी प्रकार का चैलेंज न किया जा सके।
प्रेस कान्फ्रेंस में पूर्व मुख्य मंत्री बिहार जीतन राम मांझी, बामसेफ के प्रदेश प्रभारी राम लगन मांझी एवं इमारत शरिया के कार्यवाहक सचिव मौलाना मोहम्मद शिबली कासमी भी उपस्थित थे।


