February 26, 2026

पटना में एचआईवी संक्रमित मरीजों ने स्वास्थ्य विभाग के खिलाफ किया प्रदर्शन, पेंशन बहाल करने की मांग

पटना। पटना में बुधवार को उस समय एक भावनात्मक और संवेदनशील दृश्य देखने को मिला, जब सैकड़ों एचआईवी संक्रमित मरीज बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति परिसर में अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करने पहुंचे। इस प्रदर्शन में राज्य के अलग-अलग जिलों से आए मरीज शामिल थे, जिनकी मुख्य मांगें थीं वर्षों से बंद पेंशन को बहाल करना, स्वास्थ्य केंद्रों पर नियमित दवाओं और डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा समाज और व्यवस्था में उनके साथ हो रहे भेदभाव को समाप्त करना।
अलग-अलग जिलों से पहुंचे मरीज
इस प्रदर्शन में बेगूसराय, खगड़िया, सहरसा, मधेपुरा, सुपौल सहित कई जिलों के एचआईवी संक्रमित मरीज शामिल हुए। मरीजों का कहना था कि वे मजबूरी में सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर राजधानी पहुंचे हैं, क्योंकि स्थानीय स्तर पर उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। राज्य स्वास्थ्य समिति कार्यालय पहुंचकर उन्होंने अपनी समस्याएं अधिकारियों के सामने रखीं और बताया कि सरकारी योजनाएं केवल फाइलों और घोषणाओं तक सीमित रह गई हैं।
पेंशन बंद होने से बढ़ी मुश्किलें
प्रदर्शन कर रहे मरीजों का सबसे बड़ा आरोप यह था कि उनकी पेंशन पिछले कई वर्षों से बंद है। मरीजों के अनुसार, एचआईवी संक्रमितों के लिए पेंशन योजना को वर्ष 2015 में बहाल किया गया था, लेकिन उस समय भी केवल एक महीने की राशि दी गई। इसके बाद योजना फिर ठंडे बस्ते में चली गई। मरीजों का कहना है कि बीते चार वर्षों से उन्हें नियमित पेंशन नहीं मिली है और वर्ष 2025 में भी पिछले छह महीनों से कोई भुगतान नहीं हुआ है। इससे उनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर हो गई है और कई मरीज इलाज, भोजन और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने में असमर्थ हो गए हैं।
इलाज और दवाओं की कमी
पेंशन के साथ-साथ मरीजों ने स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति पर भी गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना है कि कई जिलों में एचआईवी मरीजों के लिए नियुक्त डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। कई स्वास्थ्य केंद्रों पर जरूरी एंटी-रेट्रोवायरल दवाओं की कमी रहती है, जिसके कारण मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता। नियमित दवाएं न मिलने से उनकी सेहत पर गंभीर असर पड़ रहा है और कई मरीजों की स्थिति बिगड़ती जा रही है।
भेदभाव का दर्द
एचआईवी संक्रमित मरीजों ने यह भी बताया कि उन्हें समाज में पहले से ही भेदभाव का सामना करना पड़ता है। बीमारी के कारण लोग उनसे दूरी बना लेते हैं और कई बार उन्हें रोजगार और सामाजिक सम्मान से भी वंचित होना पड़ता है। ऐसे में जब सरकारी व्यवस्था भी उदासीन रवैया अपनाती है, तो उन्हें लगता है कि वे पूरी तरह अकेले छोड़ दिए गए हैं। मरीजों का कहना है कि यह सिर्फ आर्थिक मदद का सवाल नहीं, बल्कि सम्मान और गरिमापूर्ण जीवन का मुद्दा है।
सरकारी व्यवस्था पर आरोप
प्रदर्शन के दौरान मरीजों ने आरोप लगाया कि स्वास्थ्य विभाग और संबंधित संस्थान उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। कई बार ज्ञापन देने और आवेदन करने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। मरीजों का कहना था कि योजनाओं की घोषणा तो होती है, लेकिन उनका लाभ जमीनी स्तर तक नहीं पहुंचता। इससे उनमें निराशा और आक्रोश दोनों बढ़ता जा रहा है।
मांगों को लेकर चेतावनी
प्रदर्शन कर रहे एचआईवी संक्रमित मरीजों ने सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं की गई, तो वे अपने आंदोलन को और तेज करेंगे। उनका कहना था कि यह आंदोलन केवल पेंशन बहाली के लिए नहीं है, बल्कि इलाज, सम्मान और जीवन के अधिकार की लड़ाई है। मरीजों ने मांग की कि पेंशन को तुरंत बहाल कर उसकी राशि बढ़ाई जाए, सभी स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टरों की नियमित तैनाती हो और जरूरी दवाओं की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
स्वास्थ्य समिति परिसर में माहौल
बिहार राज्य स्वास्थ्य समिति परिसर में हुए इस प्रदर्शन के दौरान माहौल काफी गंभीर और भावनात्मक रहा। कई मरीजों ने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा साझा की और बताया कि किस तरह वे आर्थिक तंगी और बीमारी दोनों से जूझ रहे हैं। कुछ मरीजों की आंखों में आंसू थे, तो कुछ के चेहरे पर आक्रोश साफ झलक रहा था। उनका कहना था कि यदि समय रहते सरकार ने ध्यान नहीं दिया, तो हालात और भी भयावह हो सकते हैं। पटना में हुआ यह प्रदर्शन एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि समाज के सबसे संवेदनशील वर्गों के प्रति सरकारी नीतियां कितनी प्रभावी हैं। एचआईवी संक्रमित मरीज केवल दवा या पेंशन नहीं मांग रहे, बल्कि वे सम्मान, सुरक्षा और भरोसे की मांग कर रहे हैं। अब यह सरकार और स्वास्थ्य विभाग पर निर्भर करता है कि वह इन मांगों को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या इन मरीजों को उनका हक और सम्मानजनक जीवन मिल पाता है या नहीं।

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