पटना के सरकारी अस्पतालों में बेड संकट गहराया, मरीजों को फर्श और शेड में गुजारनी पड़ रही रात
- आईसीयू और वेंटिलेटर की भारी कमी, गंभीर मरीजों को नहीं मिल पा रहा समय पर इलाज
- जिलों से बढ़ते रेफरल और संसाधनों की कमी से चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था
पटना। बिहार की राजधानी पटना के बड़े सरकारी अस्पतालों में इन दिनों गंभीर स्वास्थ्य संकट सामने आ रहा है। मरीजों की बढ़ती संख्या और सीमित संसाधनों के कारण अस्पतालों में बेड की भारी कमी हो गई है। स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि कई मरीजों को वार्ड में जगह नहीं मिल रही और उन्हें अस्पताल परिसर में फर्श पर इलाज कराना पड़ रहा है। मरीजों के परिजन भी शेड और खुले स्थानों में रात बिताने को विवश हैं। यह स्थिति राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
अस्पतालों में बढ़ती भीड़ से बिगड़ी व्यवस्था
पटना के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में प्रतिदिन हजारों मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान, पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल, नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जैसे बड़े अस्पतालों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। लेकिन बेड की संख्या सीमित होने के कारण मरीजों को भर्ती होने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। कई बार गंभीर स्थिति वाले मरीजों को भी भर्ती नहीं मिल पाती, जिससे उनकी परेशानी और बढ़ जाती है।
गंभीर मरीजों को नहीं मिल पा रहा समय पर इलाज
गंभीर रोगों से पीड़ित मरीजों को गहन चिकित्सा इकाई और कृत्रिम श्वसन यंत्र जैसी सुविधाएं समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। कई मरीजों को घंटों या दिनों तक इंतजार करना पड़ता है। कुछ मामलों में मरीजों को अस्पताल के गलियारे या फर्श पर ही इलाज कराना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में मरीजों की जान को खतरा बढ़ जाता है और परिजनों की चिंता भी बढ़ जाती है।
शेड बने अस्थायी आश्रय स्थल
अस्पतालों के बाहर बने शेड अब अस्थायी आश्रय स्थल में बदल चुके हैं। यहां मरीज और उनके परिजन प्लास्टिक और चादर बिछाकर रात गुजारते नजर आते हैं। कई मरीज ऐसे भी हैं जिनके शरीर में उपचार के लिए पाइप लगे हुए हैं, लेकिन उन्हें वार्ड में जगह नहीं मिल पाई है। यह दृश्य स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को दर्शाता है और बताता है कि संसाधनों की कमी किस हद तक बढ़ चुकी है।
जिलों से बढ़ते रेफरल का दबाव
इस संकट का एक बड़ा कारण जिलों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी भी है। अधिकांश जिला अस्पतालों में सुपर विशेषज्ञता वाली सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। गहन चिकित्सा इकाई, रक्त भंडार, आघात उपचार केंद्र और आपातकालीन शल्य चिकित्सा जैसी सेवाओं का अभाव होने के कारण गंभीर मरीजों को पटना रेफर कर दिया जाता है। इससे राजधानी के अस्पतालों पर अत्यधिक दबाव बढ़ जाता है और यहां की व्यवस्था प्रभावित होती है।
मरीजों और परिजनों की बढ़ती परेशानी
मरीजों और उनके परिजनों की पीड़ा इस संकट को और स्पष्ट करती है। समस्तीपुर से आई चिंता देवी अपनी मां के हृदय रोग के इलाज के लिए पटना पहुंचीं, लेकिन उन्हें लंबे इंतजार के बाद भी भर्ती नहीं मिल सकी। मुजफ्फरपुर के सतेंद्र कुमार ने बताया कि सिफारिश के बावजूद उनके भाई को बेड नहीं मिला। मोतिहारी की पिंकी देवी अपने पति के मस्तिष्क ट्यूमर के इलाज के लिए कई दिनों से अस्पताल परिसर में रह रही हैं। गया के उमेश यादव अपनी पत्नी के कैंसर इलाज के लिए पटना आए, लेकिन उन्हें फर्श पर इलाज कराना पड़ा। मधेपुरा के बबलू कुमार पिछले तीन महीनों से अपनी मां का इलाज करा रहे हैं, लेकिन बेड की समस्या लगातार बनी हुई है।
निजी अस्पतालों से बढ़ रहा दबाव
सरकारी अस्पतालों पर दबाव बढ़ने का एक कारण निजी अस्पतालों से भेजे जा रहे मरीज भी हैं। कई निजी अस्पताल गंभीर मामलों को संभालने में असमर्थ होने पर मरीजों को सरकारी अस्पतालों में भेज देते हैं। इससे पहले से ही सीमित संसाधनों पर निर्भर सरकारी अस्पतालों की स्थिति और अधिक खराब हो जाती है। आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यम वर्ग के लोग निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा पाते, इसलिए उन्हें सरकारी अस्पतालों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
बेड और स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी
महालेखा परीक्षक की वर्ष 2024 की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में आवश्यकता के मुकाबले लगभग 64 प्रतिशत बेड की कमी है। राज्य में करीब 91 हजार से अधिक बेड की जरूरत है, जबकि उपलब्ध बेड की संख्या लगभग 32 हजार ही है। इसके अलावा डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की भी कमी बनी हुई है। स्वास्थ्यकर्मियों की कमी के कारण मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता और इलाज की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
पिछले दशक में तेजी से बढ़े मरीज
पिछले दस वर्षों में मरीजों की संख्या दो से तीन गुना तक बढ़ गई है, लेकिन उसी अनुपात में अस्पतालों का विस्तार नहीं हो सका है। नई स्वास्थ्य सुविधाओं का विकास धीमी गति से होने के कारण वर्तमान व्यवस्था पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। कई अस्पतालों में उपकरणों की भी कमी है, जिससे आधुनिक इलाज उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।
सुधार की आवश्यकता पर जोर
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जिला स्तर पर बेहतर चिकित्सा सुविधाएं विकसित की जाएं तो पटना के अस्पतालों पर दबाव कम हो सकता है। इसके लिए नए बेड की व्यवस्था, स्वास्थ्यकर्मियों की नियुक्ति और आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता आवश्यक है। साथ ही जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति भी जरूरी है ताकि मरीजों को राजधानी आने की आवश्यकता कम पड़े।
बढ़ता संकट चिंता का विषय
पटना के सरकारी अस्पतालों में बेड और संसाधनों की कमी ने स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोर स्थिति को उजागर कर दिया है। यदि जल्द ही इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यह संकट और गंभीर हो सकता है। आम जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के लिए सरकार और संबंधित विभागों को शीघ्र प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि मरीजों को समय पर इलाज मिल सके और उन्हें फर्श पर रात बिताने जैसी स्थिति का सामना न करना पड़े।


